"मैं" हिंसा हूँ कितनी करूँ कोशिश नज़र नेक नहीं होती भांप लेती है, आँक लेती है, "फर्क" कितना भी सर छुपाए उन्हें नाप लेती है "फर्क" है तो दोष है रोष है ! तैयार होता हिंसा का शब्द कोष है, कम है, ज्यादा है वादा, इरादा, फ़रियाद, बंटवारा आकांक्षा, अभिलाषा, ढाढ़स, दिलासा "मैं" अतीतयुक्त है कब "मैं" रिक्त होगा "आज" में जीने को मुक्त होगा (जे.कृष्णमूर्ति के हिंसा पर उठाये प्रश्नों से उठे प्रश्न)
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।