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आज कुछ करना था!

भूख थी प्यास थी, खटास थी मिठास थी, लगे परोसने जो भी, ख़ास थी न ख़ास थी! कुछ करने को बैठे थे, कुछ कर बैठे हैं, अपने ही इरादों से, क्यों भला ऐंठे हैं!   कुछ कहने की ललक है, कुछ दूर फलक है, शब्दों को पिरोते हैं, शाम तक चाँद खींच लेंगे! यूँ वक्त को हम गुजारते नहीं, न लम्हों को संवारते हैं, मेकअप का शौक नहीं, फिर भी आपके सामने हैं! खलबलाहट है बस इतनी खबर है, दिन बस 2 लम्हे पहले शुरू हुआ, चिंता न करें पेट साफ है ! दिन गुजरा क्या, क्या रात आई? खो गयी न जाने कहाँ तऩ्हाई,   न मर्ज़ कोई न दवाई, क्या खामी है और क्या भरपाई! मसरूफ़ हैं कितने कि खाली-खाली हैं, अपनी ही हरकतों के हम सवाली हैं! कुछ छूट गया क्या, या बाकी है, एक हलचल थी जो काफ़ी है, आज कुछ करना था, गौर करें!

सचपन!

सचपन! 8-10 साल की उमर , और मज़बूत कमर ,  एक और को संभालने को , खेलने की उमर है , बचपन नाम है , चंचलता पहचान है , हरकतें है वैसी ही , और बड़ी जान है , तैयार फ़िर भी , हमेशा , अपनी नज़र और  अपनी कमर से , कब रो दे ,  माँ रोटी करती है , भूख लगी है ,  माँ पानी भरती है , गिर गया ,  माँ मज़दूरी पे है , आप ही बताईये ,  क्या कहें ? बचपन है? पर ये कह कर दूर खड़े होना , बचकाना होगा , बदनाम , बचपना होगा , इसलिये कमर कसते हैं , हंसते हैं , यही हमारा सच है , गुम कहीं बचपन है , जो है बस यही सचपन है !! (सरकारी आँकड़े कहते हैं, बच्चे स्कूल जाते हैं, और सच, छह मुसहर बस्तियों में से लगभग सभी बच्चे स्कूल नहीं जाते!)

चार दिन बचपन!

हम भी बच्चे है ! हमारे भी नाम हैं , हम भी खेलते हैं , हाँ ! हमें चीज़ें नहीं लगती खेलने के लिये ! नहीं , नहीं , लगती तो हैं , लकड़ी का टुकडा , मिट्टी का ढेला , जमीन , दीवारें , कभी कभी हम भी कपड़े पहनते हैं , कभी मट्टी से भी काम चला लेते हैं , काम , अपने से छोटे को गोदी उठाना , अब खेल लो , या झेल लो , सच्चाई , जो साथ होती है , साथी नहीं , हम हर रोज़ सीखते हैं , अनुभव से , अभाव से , और अपने पर न होते किसी भी यकीन के प्रभाव से क्लास में पीछे की जगह से , क्यों हमें ही साफ़ करना पड़ता है , शौचालय , उसकी वज़ह से , स्कूल में मास्टर छड़ी से , पर आप क्यों परेशान होते हैं , हम इंसान नहीं हैं , हम एक जात है , मुसहर , मेहतर , ड़ोम , हम गिनती में नहीं आते , फ़िर भी अगर आप जानना चाहते हैं , तो जल्दी करिये , हमारा बचपन छोटा रहता है , और हमारी गोद जल्दी भरती है , आने वाले अगले बचपन से बचपन , और बड़े होने के बीच के मंज़ुर और मज़बूर अपने सचपन से ! (पटना कि धनरुआ ब्लॉक में लालसाचक क्लस्टर में मुस...