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जज़्बाती ज़मीन

 ज़मीन हिल गयी,  पैरों के नीचे की  सच्चाई बदल गयी,  कुछ लम्हा सही,  रगों की नीयत बदल गयी,  कुछ कह रही थी,  या सबर टूटा कि  बरसों से सह रही थी! जमीन पिघल गयी, ज़ज़्बातों की झड़ी, रह गयी अनकही कोई बात कसर है, या कही नहीं अपनी, बरसों का असर है? हिल गयी, पिघल गयी, आज ज़मीन आसमाँ निगल गई! ये कैसी प्यास थी, या बरसों से दबी आस थी, ओ आज बदहवास थी? ख़ामोशी अच्छी है, सिर्फ़ सुनने को, 'कहने को' खामोश क्यों करिए? जब भी, जो भी, दिल कहता है कहिए! जुड़िए अपनी जमीं से, जज़्बाती रहिए, ज़ज़्बात कहिए!

अरमान, जज़्बात और सामान

कुछ लम्हे उम्मीद के, कुछ साथी नसीब के, जिंदगी अब भी गुज़र रही है करीब से अरमान सपनों मे आसान बनते हैं आँख उठती है तो आसमान बनते हैं इरादॊं के सामान बनते हैं, बेहतर है आप अपनी जान बनते हैं हर जज़्बात कहाँ शब्दॊं मै बयां होते हैं, कुछ अरमान रंगॊं मै जवां होते हैं, हर सच्चाई नज़रॊं से नज़र नहीं आती, वक्त के दीवारॊं पर निशाँ होते हैं नजर उठ कर कहाँ तक पहुंचेगी, उम्मीद अब कौन से अरमानो को सीचेंगी, अपने एहसासॊं से जुड़े रहिये, पुकार आपको कशिश बन कर खींचेगी.. क्यॊं इंतज़ार करते हैं आप ही जिन्दगी हैं इरादे आप के, आप की बंदगी हैं, कदम उठाइये और जमीं नज़र आएगी सपने हॊंगे और नींद नहीं आएगी अश्क बहते हैं ज़ज्बातॊं कि जमीं पर उम्मीद कायम रहे जरा यकीं कर मुस्करा और मौसम को हसीं कर हल्का लगेगा, चल मुश्किलॊं को यतीम कर कुछ नयी बात करें अपने होने में क्या मजा, जो है, उसे खोने में आज जी भर सो लो, रात होने में सपने, काम आयेंगे सुबह बोने में तुम, सफ़र हो अपना! तो रास्ता क्या हो ? मोड़ मिलेंगे सो वास्ता क्या हो सच को हमसफ़र रखना क्या सोचें अंजाम क्या हो