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मेरे प्रियजनों!

 

मैं टुकड़ा भारत!

मैं भारत हूं,  मैं भी, टुकड़े टुकड़े, रोज टूटता, बिखरता हूं, अपनी नजरों में गिरता हूं, कभी रोहित के गले का फंदा, कभी कठुआ का दरिंदा, कभी तबरेज़ की लाश हूं, कभी बदायूं का काश हूं, मीलों चलता, मैं ख़ामोश हूं, और मैं भी, शब्दों की धार हूं, पूरा ही हथियार हूं, फिर भी बेकार हूं, पूरा का पूरा एक टुकड़ा मैं भी, भारत, टूटा हुआ!

हम आप आज कल!

वो ज़हर जो हमको क़ातिल करता है, रामबाण है, अचूक असर करता है! कौन है जो दिल ये नफ़रत भरता है? आप ही आइए जहां हम मिलते हैं ! अलग चाल है सबकी और चलते हैं!! रिश्ते क्यों हम को अलग करते हैं? जो भी ख़बर मिली वो ही सच है? बुरी है बात और किसी के सर है! डर और नफ़रत आपके घर है! किन रंगों से आईने रंगवाए हैं? क्यों नफ़रत नज़र नहीं आए है? सड़क पर मार दिया ये न्याय है? रामराज्य, राम नाम, आसाराम, बाबाराम, घोर कलयुग है और ये सब राम के काम? सोच, तर्क, विज्ञान का तो काम तमाम! धर्म का धंधा, खरीददारी चंदा, राम नाम में बढ़े फायदे में बंदा, घटिया नीयत और काम गंदा!

गुनाह को पनाह!

  कितने हम तरक्क़ी से ग़ुमराह हुए हैं, आँख सामने हमारे सारे गुनाह हुए हैं! भगवान के नाम पर इंसानियत खारिज़ है, भक्ति में कैसे कैसे आज गुनाह हुए हैं? नफ़रत ने सबको एकराय कर दिया, खुलेआम सड़क पर गुनाह हुए हैं! मार देने को अब इंसाफ कहतें हैं, इंसाफ के नाम पर गुनाह हुए हैं! कानून बिक गया ओ इंसाफ डर गया, बढ़ी ठाट से इन दिनों गुनाह हुए हैं! मक्खियों माफ़िक भिनभिनाते हैं अंधभक्त, शाह_ई इशारों से आजकल गुनाह हुए हैं! लाखों चुप्पियों को कैसे शराफ़त कह दें ! चुप हैं इसलिए क्योंकि गुनाह हुआ है! मस्ज़िद को तोड़ कर मंदिर बनाते हैं, बड़ा धार्मिक इनदिनों गुनाह हुआ है!

टूटती सच्चाईयाँ!

पैर ही छा ले बन गए हैं हवा के निवाले बन गए हैं, जुड़े हाथ प्या ले बने हैं अपने मुल्क के निकाले बने हैं! इस मुल्क में  सब कुछ चलता है! जैसे मजदूर हजार  मील ! घर बैठे  टीवी  पर देखने मिलता है! देश को  बेरहमी  से शमशान कर दिया! भुख और मौत  को मुसलमान  कर दिया! नफ़रत  या द्वेष  कहते हैं,  किसने  कहा देश  कहते हैं! नफ़रत है, द्वेष है,  भेड़िए भेड़ों के भेष  हैं, बाकी सब ठीक,  बड़ा  प्यारा अपना दे श है! कोई सर परस्त नहीं,  मुल्क को यतीम हम, दिलासे खो खले निक ले,  सारे यक़ीन कम! दूरियां बनाए रखना पुरानी परंपरा है, बीमार संस्कृति बड़ी काम आ रही है! बीमारी से मुक्ति मिली,  गरीबी से निज़ात,  जात, धर्म पूछें तो  और बिगड़ जाएगी बात!

कोरोना का रोना!

भूख कहाँ बीमारी है, मजबूरी कैसा रोग है? जोग है पाखंड का और  ताकत मनोरोग है! भूख आग भी है और पानी भी हवा होने वाली चीज़ नहीं, भड़केगी या बह जाएगी एक और ज़माना कर जाएगी! सवाल मत उठाइए, बस मान जाइए, भीड़ में आइए या भाड़ में जाइए! आम आदमी हैं औकात में आइए, माना जाइए या पाकिस्तान जाइए! कहा है तो कुछ सोच कर ही न, काहे दिमाग की बत्ती जलाइए? सच आलसी हैं आपके  या होशियार, ख़बरदार है? या आप बस हाँ में हाँ मिलाते  सवालों के गुनहगार हैं?। एकता की खोखली बात है, अनेकता की लगी वाट है! घर बैठे दिए जलाते हैं क्या ठाठ है, भूखे मजबूर को लाठी लात है! हमारे लिए तो एक वो ही हैं, महान हम जान रहे है आप जान स जाइए! 'चुप रहिए, सर झुका रहिए', सरकार कहे! जिसके भी सवाल हैं बस वो खबरदार रहे!! अंधेरे को देर नहीं और देर को अंधेर है झूठ है जो कहते कि अब भी देर-सबेर है! नफ़रत की ज़िहाद छेड़ी है  हिंदुत्व ठेकेदारों ने, बस भक्ति, श्रद्धा से  कब इनका काम चला है !

कोरोना बहके बहकाए!

कहते हैं आपदा बड़ी है, जरुरत सब साथ आएं, हाथ बटाएं, जुगत बिठाएं, कोरोना से बचें-बचाएं,  और फ़िर शुरू तमाशा,  काम की बात गुल,  मार्च अप्रैल फ़ूल- पुरा बीमारी के साथ, बेचारी से मौत डॉक्टर नर्स बिना जरूरी सामान ताली सुन कर चलाओ काम! जो बीत गई सो बात गई, बड़ी रोशन कल की रात गई, जोश जुनून जज़्बात गई, समझ को जैसे लात गई, भुल सब हालात गई, कोरोना को कहते मात गई? सोच भी जल गई, इरादे भी जल गए, फिर रोशनी की आड़ में, अंधेरों से मिल गए, भीड़ में निकल गए! ज़िंदगी जी रही है बंद कमरों में, मौत सड़कों पर मजदूर चर रही है! टीवी पर देखिए आराम से खबरें, नफ़रत आपकी रगों में पसर रही है! बंद हैं सब चारदीवारी में, वो सच जिनको आवाज़ नहीं, मासूम जिनकी परवाज़ नहीं, गालियां, थप्पड़, चीख़, दया की भीख, दस नौ आठ , दस नौ एक (10 दिन के लॉक डाउन में लगभग एक लाख फ़ोन  (1098-चाइल्डलाइन, 1091 महिला हेल्पलाईन) आए,  बच्चों और महिला को हिंसा से बचाने के लिए ) खबर सारी हिंदू भई, कुत्तन सा सोर मचाई, तबलीकी, तबलीकी बोल कान सबई ...

कोरोना बीमार!

बीमार करके फ़िर दवा देते हैं, आपको तारीफ़ की वज़ह देते हैं! दवा दे कर बीमार करते हैं, किराया बस को हज़ार करते हैं!! बस इरादा नहीं काफ़ी, नेकनीयती का, पहले ये कहिए क्यूँ हमें लाचार करते हैं?? क्यों कोई शराफ़त देखे उनकी, जो? सवाल पूछने पर गुनाहगार करते हैं? छोड़ दिया सड़क पर लाकर सबको, सरकार हाथ जोड़ मज़ाक करते हैं? भूख, प्यास मजबूरी से मर गए कई, कहते हैं, हम मन की बात करते हैं!! गलती नहीं मानते, पर माफ़ी मांग गए, तमाशे वो ऐसे सौ -हजार करते हैं! मिला बहाना तो इल्ज़ाम ज़िहाद का, नफ़रत से सरकार बड़ा प्यार करते हैं? बीमारी को मज़हब, जंग ओ जिहाद? दिलों में दीवार हो वो हालात करते हैं! कातिल हैं वो दवा की बात करते हैं, जानलेवा है वो जो इलाज़ करते हैं!

उम्र जान!

चीज़ क्या है संविधान क्या जान कीजिए? लाठी को मिलेगी भैंस ये ही कानून लीजिए! कब सोचा था सर पड़ेंगे ऐसे फिरकापरस्त, मुश्किल न हो आखों पर रेबान लीजिए!! आंखों में उनके सरम कैसे ये मान लीजिए, कपड़ों को देख कर उन्हें पहचान लीजिए! इस हिंदुत्व-स्थान में आपको आना है बार बार, पहले अपने जमीर की ख़ुद जान लीजिए!                          किस ने कहा कि आपका भी है हिंदुस्तान? पहले हज़ार बार जुबां पे श्री राम लीजिए !!! होंगे आप सिक्ख, ख्रिस्ती या मुसलमान, हिंदू का है हिंदुस्तान पहले मान लीजिए!! बड़े प्यार से करते हैं वो नफ़रतों की बात, लीचिंग की बात आप ज़रा आसान लीजिए! मुल्क चीज़ ही क्या, काहे मेरी जान लीजिए, नफ़रत के हर तरफ चलो बागवान कीजिए! भूखे भजन नहीं होता ये है पुरानी बात, करोड़ों का है काम जो श्रीराम कीजिए!!

जन्नत कहाँ?

सुना है सब आतंकी हैं, इस जगह! हर एक शख़्श! बच्चा, बूढ़ा, आदमी औरत, और एल जी बी टी क्यू!? क्यूँ?? यहाँ की हवा में शायद, कोई बात हो! क्यों? कश्मीर! वही जगह दुनिया की, "अगर जन्नत है तो यहीं, यहीं, यहीं है" कश्मीरी भी वही हैं? वादियां भी वही, वही बर्फ, वही चिनार, वही डल, वही हज़रतबल! फिर बदला क्या है? हवा में, क्यों बारूद घुल गया है? सबकी नसों में कड़वाहट घोलने वाला! ये ज़हर कब मिल गया है? ये ज़हर आया कहाँ से? कौन है जो बदलाव नहीं बदला बोलता है?

मजबूर नफ़रत

अपनी जंग के सब मजबूर हैं, सच्चाई के कौन जी-हुज़ूर हैं? गुस्से में इतने के खुद से दूर हैं, कैसी मुल्कीयत के पाकिस्तान ज़रूर है? आवाज़ अलग है तो उसको जला देंगे, कौन इंसान जिसको खून जरूर है? नफ़रत के कितने सब मंज़ूर हैं, क्या कीजे के आदमखोर हुज़ूर हैं! सच छुप जाए यूँ के हम मग़रूर हैं, डरी हुई आवाम को छप्पन जरूर है! इंसान ही इंसान को काफ़ी पड़ेगा, कौन कहता है क़यामत जरूर है? लाज़िम है के खामोशी एक राय है, कुछ तो इशारा हो के नामंजूर है? दूध का रंग सुर्ख नज़र आता है, क्यों रगों में आज इतना सुरूर है? मूरख गिन रहे हैं अपने और उनके, आख़िरकार इंसान को इंसान जरूर है!