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करवा चौथ!

दुनिया में औरतें कम हैं, और वो मरती भी जलदी हैं? औरत में ताकत कम होती है, कम उम्र मे लड़कियाँ ज्यादा मरती हैं, फ़िर भी वो ही भूखी प्यासी हैं, लंबी आयू वालों के लिए उपवासी हैं? इससे क्या निष्कर्ष निकालें ? औरत मूरख है? नितांत!निसंदेह! निश्चित्त! और मर्द? कमीना? गैर-जिम्मेदार?  असंवेदनशील? तंग सोच? डरपोक? लालची? और चुँकि औरत मूरख है वो या मान बैठी है कि किस्मत में यही लिखा है? इनसे तो होगा नहीं, मुझे ही कुछ करना होगा! उनकी उम्र लंबी हो या नहीं, मुझे शायद इस नरक से जळी छुट्टी मिले! इल्लत कटे!

बिकाऊ सरकार!

बिक गए एक इश्तेहार बनकर, सर आये जो सरकार बनकर, उनकी शराफत के बड़े चर्चे हैं , जो सरपरस्त है गुनेहगार बनकर जियो(Jio) और जीने दो की बात, बिक गया ईमान बाज़ार बनकर! भरोसा(रिलायंस) करो दिन अच्छे की बात, अंधेर नगरी के चौपट राजा बनकर! फौजी की शहादत, 4G की वक़ालत, धंद्या हर गन्दा है सियासत बनकर! बाँटने छाँटने और काटने की बात, जमहूरियत चल रही रियासत बनकर! मन की बात और विरोध को लात, सच्चाइयाँ तंग हैं हालात बनकर! ! सच के पहलू ज़रा जांच-परख लें -  http://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/Reliance-Jio-got-530-million-undue-benefit-CAG/articleshow/47213222.cms?from=mdr

यकीं यूँ कि. . . !

वो भी अज़नबी था और तू भी अज़नबी है, तख्त पलटा भी है या ये झूठा यकीं है? यकीं का खुदा कौन हो, यकीं को जमीं कौन हो अज़नबी का यकीं करें फ़िर अज़नबी कौन हो? तमाम यकीं है और युँ ही तमाम होते हैं, आँखें बंद है और उम्मीदों पे जवाँ होते है! तख्त की बात करके क्यों अज़नबी करते हैं, दिल में रखिये दिल का ही यकीं करते हैं! अपने पर ही यकीं रखिये लंबे साथ आयेगा, पैर फ़िसले भी तो दूसरे का नाम नहीं आयेगा! इतना कीजे यकीं कि उसको भी आ जाये लड़खड़ाते पैरों को जैसे जमीन आ जाये! रंग आसमां के जमीं के, थोड़े कुछ आपके यकीं के नज़र बायें करिये ज़रा, रंग और भी हैं जिंदगी के! अब ये ना कहिये कि बेवजह नुक्ताचीनि करते हैं, नमक आपका है, हम बस जरा नमकीं करते हैं!

बेदखल !

अपने ही घर से निकाले गए कहता है अब तक पाले गए जैसा था सांचा ढाले गए हम कहाँ वक्त के हवाले गए  झूट के जाल में जाले गए हर सच पर अपने सवाले गए अपने हाथों के निवाले गए उनके हाथों में प्याले गए कैसे ये आँखों को जाले गए सारे उसूलों को लाले गए रस्ता दिखे यूँ उजाले किये उसने दरवाजों को ताले किये [कई कई साल पहले, लोगों के छोटे दिल और सिकुड़े हुए दिमाग से प्रभावित होकर रचित]

राम, शमशान और बदलते रस्ते !!

खुद को आज कुछ रुका हुआ पाते हैं, कौन जाने यहां से रास्ते कहां जाते हैं!  मुश्किलों को कंधे पे ले कर रामनाम करते हैं, क्यों आप अपनी दुआओं को शमशान करते हैं! ये अभी अभी की बात है, या पहले कि कोई रात है, अब अजनबी से क्या कहें, ये अजनबी से बात है! उस दौर से गुजरते हैं, कि उसुलों को फ़िज़ूल करते हैं, जिस जमीं पर खड़े हैं कीमत उसीसे वसुल करते हैं! बात पुरानी ही सही, तारीख बदल चुकी है, समझ बारिख है, गुमां है, रस्ते बदल चुकी है ये भी एक पहचान है, खुद से ही अंजान है लिये बोझ कुछ होने का, खालीपन सामान है! उड़ने का जिगर है, क्या पुछें उड़ना किधर है, हवा का रुख एक जाल है, या कोई सवाल हैं? क्यों रस्ते भटकना, सफ़र को हमसफ़र कीजे, जो अक्स यकीं में उस को ही असर कीजे! सच सब तरफ़ मौज़ुद है उसकी क्या तलाश, नज़र होगी आपकी जो दिख रही है लाश!

इमरोज़

बड़े कायदे से एक कायदा तोड़ दिया, दुनिया को सरेआम गुमराह छोड़ दिया! कहें वो जो कहते हैं, यही होता आया है, समाज़ सदियों से यूँ ही सोता आया है! मर्ज़ी थी सो हमने कर दिया मन-माफ़िक पहले भी ये इल्ज़ाम अपने सर आया है! दुनिया हमारे कदमों में कभी भी नहीं थी, कुछ अपनों से आज़ ये पैगाम आया है!  बड़ी बेमुरव्वत निकली मोहब्बत अपनों की,  कहाँ  दुआओं में आज अपना नाम आया है? मुश्किलों में कब हमने अपना साथ छोड़ा ये अपनापन ही अपने बड़े काम आया है, कोई भी अकेला नहीं है इस सफ़र में, फ़िर क्यों रास्तों पर इल्ज़ाम आया है?  अरसे से एक दुआ थी जो कबूल हो गयी,  क्यों किसी ज़ुबान पर काफ़िर नाम आया है!  इल्ज़ाम लगते हैं बहक गये हैं हम बेखुदी में युँ तो आज ही हाथों मे अपने जाम आया है! (इमरोज़ ने सितम्बर २००० में‌ हैदराबाद ऑल्ड़ सिटी में एक अंतराष्ट्ईय संस्था प्ले फ़ॉर पीस में एक वॉल्टीयर का काम शुरु किया था, 16 साल की उमर में, आज वो अमेरिका में प्ले फ़ॉर पीस की ऑपरेशन मैनेजर हैं और कोस्टारिका की UN पीस युनिवर्सिटी से Masters कर रही हैं!)