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देखते हैं, क्या?

जिसे देखते हैं,  वो भी देखता है, नज़र मिल रही है,  या बस एक इत्तफाक है, ये वो लम्हा है, जो खास है. और उसके पहले जो पल था, वो भी खास ही हुआ? नहीं तो ये मिलना इत्तफाक न हुआ? और नज़र में आ गए, उसके बाद?  वो भी खास ही हुआ न? नहीं तो वो लम्हा क्या बकवास हुआ? जिसके बाद कुछ न खास हुआ? नज़रिए की बात है,  सच एक लम्हा भी अगर जिंदगी का खास है, तो ताउम्र जिंदगी खास है देख सकें तो देखें, सच तमाम है इर्द–गिर्द, जो आप चुनेंगे, वो ही आपका खास है!!

पहचानें!!

अपनी नजर से खुद को देख पाएं कभी ऐसा एक आइना बना पाएं! शोर बहुत है मेरी नाप तौल का , कोई तराज़ू मेरा वज़न समझ पाए? छोटा बड़ा अच्छा बुरा कम जादा, वो सांचा कहां जिसमें समा जाएं? नहीं उतरना किसी उम्मीद को खरा! जंजीरें हैं सब गर आप समझ पाएं! मुबारकें सारी, रास्ता तय करती हैं, 'न!' छोड़! चल अपने रास्ते जाएं!! वही करना है जो पक्का है, तय है? काहे न फिर बात ख़त्म कर पाएं? अलग नहीं कोई किसी से कभी भी, ज़रा सी बात जो ज़रा समझ पाएं!!

भीड़ की रीड!

सवाल?  क्यों लोग लगे रहते है दिन भरने में,  रोज़-रोज़ वही करने में जिसमें जी नहीं? ये कहते हुए कि ये ज़िंदगी का सच है,  गुजारे की demand - too much है? क्या उऩ्हें मजबूर करता है? अपने अंतर से दूर करता है? क्यों ये सवाल? क्यों वक्त के मारों के जख्म पर नमक छिड़क रहे हो मेरे भाई ? चल रहे हैं वही जिंदगी ने जो राह दिखाई , आप ने सपनों को रास्ता बना लिया , अपनी मुश्किलों का नाश्ता बना लिया , आईने के सामने खड़े होकर सिर्फ़ अपनी खूबसूरती या  उसकी कमी को परखने कि जगह , आपने सवाल पूछ लिये ? तो लो अब भुगतो , अब आपको जिंदगी मज़े से जीनी पड़ेगी , कभी आप भी परेशानियों से अपना सर खुजाएंगे , ( तेल क्यों नहीं लगाते हीरो ) पर फ़िर भी मुस्काराऐंगे , आपने अपने सपनों को पालना सीखा है , पर घर और स्कूल में उनको टालना सिखाते हैं , और जरूरतों का क्या बतायें , उसकी परिभाषा कहां से लायें , देखो तो , लाखों हवा खा कर भी जिंदा हैं ? सवाल लाख टके का है ? ताकत किसके हाथ में है ? " कौन कहता है कि चक्की में पिसे रहो ?" घर - बाहर , स्कू...

छान-बीन?

रिश्ते चुनते हैं‌ हम को, कि हम रिश्तों को चुनते हैं, रिश्ते बुनते हैं हम को, कि हम रिश्तों को बुनते हैं! अपने बनते हैं युँ ही, कि युँही बनते हैं अपने हैं, सुनते हैं जो  हम  कहते, या कहते हैं हम सुनते हैं नाम किसका है और क्यों खुद को सामान करते हैं, कुछ खबर है आप को युँ खुद को दुकान करते हैं! नज़र इरादों को जगाती है, उम्मीद अभी बाकी है, युँ छोड़िये फ़िक्र करना तनिक भी, अभी बेबसी काफ़ी है! लंबी उमर है क्या जल्दी है नाउम्मीदगी की,  दो-चार दिन जरा कोशिश के लुत्फ़ ले लो! उम्मीद पलती है गहरे अंधेरे कोनों में, क्या रखा है मुलायम से बिछौनो में! बुरे हालात हैं पर भी मुस्कराते हैं, जानते हैं ये सच ही झूठी बातें हैं! खामोशी सुनती नहीं, आवाज़ों ने बहरा कर दिया, मेरी सोच ने ही, मेरी आज़ादी पर पहरा कर दिया!  वही दिखेगा सामने जो नज़रिया कर लिया आंखें बंद की और अंधेरों को गहरा कर लिया! इरादे सफ़र को निकले हैं, रस्ते इबारत करने,  मुश्किलें हों भी तो रंग तजुर्बों के नफ़ासत करने! इबारत की इज़ाजत है, या की कोई हिमाकत है, अधुरे रह गये सफ़र और बस थो...