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बचे बच्चे!

बच्चे मन के सच्चे, 'बड़े' कान के कच्चे, मज़हब ढोंग दिखावा, भारत भाग विधाता!   कहने की बात की बच्चों में भगवान है, सच्चाई ये की आधे-अधूरे इंसान हैं!   वो तोड़ते पत्थर धूल से लथपथ कर, आप तालियां बजाइए चाँद की यात्रा पर! बच्चे हमारा भविष्य हैं, कहावत है, लाखों भूखे-नंगे है किसकी ज़हालत है!?    कचरे में चुनते हैं धड़कन ज़िंदा बच्चे, मुर्दा बचपन! बच्चे सब को प्यारे हैं, फिर क्यों? अनगिनत बेचारे हैं!? बच्चों के लिए सबको बड़ा प्यार है, इस प्यार के लाखों बड़े गुनहगार हैं! 'अपने ही'बच्चों को सब ज़ख्म देते हैं! फिर भी हम अपनों की कसम लेते हैं? अगर एक भी बच्चा भूखा है, तो देशभक्ति का इरादा झूठा है!

सचपन!

सचपन! 8-10 साल की उमर , और मज़बूत कमर ,  एक और को संभालने को , खेलने की उमर है , बचपन नाम है , चंचलता पहचान है , हरकतें है वैसी ही , और बड़ी जान है , तैयार फ़िर भी , हमेशा , अपनी नज़र और  अपनी कमर से , कब रो दे ,  माँ रोटी करती है , भूख लगी है ,  माँ पानी भरती है , गिर गया ,  माँ मज़दूरी पे है , आप ही बताईये ,  क्या कहें ? बचपन है? पर ये कह कर दूर खड़े होना , बचकाना होगा , बदनाम , बचपना होगा , इसलिये कमर कसते हैं , हंसते हैं , यही हमारा सच है , गुम कहीं बचपन है , जो है बस यही सचपन है !! (सरकारी आँकड़े कहते हैं, बच्चे स्कूल जाते हैं, और सच, छह मुसहर बस्तियों में से लगभग सभी बच्चे स्कूल नहीं जाते!)