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निर्माण गीत a Mary Oliver poem

गरम मौसम कि एक सुबह,  बैठ, एक टीले के नीचे एक जगह,  मैं सोच रही था ‘ईश्वर’! समय सदुपयोग के लिए  एक अच्छी वज़ह!! नज़र आया एक मात्र कीड़ा,  टीले की रेत को सरकाती इधर-उधर, लुढक-पुढक,  भरपूर जोश,  विनम्र सोच! उम्मीद है ये हरदम ऐसा ही रहेगी, (यही दमखम) हम में से हर एक  अपने रास्ते चलते इस जग को रचते!

बूंद बूंद तिनके, आसमां चुन के!!!

कोशिश नापिये, वही मंज़िल जाती हैं, हर कोशिश अंजाम है, क्यों 'मुश्किल'पहचान है! रेत के भी महल होते हैं, इरादे घड़ियों से न नापो! हर तिनका आसमान है, गर उसे अपनी पहचान है! हर पत्ता हवा है, उसको रुख पता है! हर बून्द समन्दर काबिल है, हर तहज़ीब बड़ी ज़ाहिल है! नज़र हो तो बून्द समंदर है, समझो क्या आपके अंदर है! बिना जमीं के आसमान कुछ नहीं, मुश्किल न हो तो आसां कुछ नहीं!

बदलते लम्हे!

छटपटाते लफ्ज़, जब हलक से निकलते हैं, चहक जाते हैं, महक जाते हैं, कभी बहक जाते हैं, कुछ असर होते हैं, कुछ कसर रहते हैं आज़ादी के ऐसे ही सफ़र रहते हैं! उम्मीद रास्तों से,  सफ़र को मंज़ूर कहाँ हैं, अधूरे रहे मुसाफ़िर,  और हर ओर मकां हैं! अरमानों की आग पर होंसलों को सेंकिये, कोशिशों के हथौड़े, जब जोर से पड़ेंगे, फ़िर रास्ते मन-माफ़िक मुड़ेंगे हाल से, हालात से, रुठे हुए सवालात से, किसका जिक्र करें? और किस माइका लाल से? घड़ियां चुराते हैं दिन से,  कि चंद लम्हे हाथ आयेंगे आप के हाथ में रख्खे हैं  हाथों से फ़िसल जायेंगे!  आप के हाथ में रखा है हाथ कि संभल जायेंगे, घड़ियां चुराते हैं दिन से,  कब चंद लम्हे हाथ आयेंगे! काबिल हैं मौसम,और हालात भी मेहरबान हैं, कुछ दिन जिंदगी कितनी आसान है, आपके सफ़र में अगर अब भी जान है, याद रहे सारी मुश्किलों को शमशान है! कितने यकीं हैं सामने किसको आसमान करें रास्ते मिल जायेंगे, साथ, कौनसा सामान करें?