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पहचान - एक ज़ुबान

ज़िंदगी नाम है, या काम? संज्ञा, सर्वनाम? क्रिया, विशेषण? या ये सब तमाम? क्रिया बिन क्या नाम? नाम बिन कोई काम? काम कोई विशेष हो जो बन जाए सर्वनाम? या सर्वनाम काम है? जैसे उपनाम है, जन्म दर जन्म, आपको जकड़े हुए, जात, धर्म विशेषण, क्रिया एक शोषण? कुरीति, कुपोषण? और उन सबका क्या, जो बेनाम हैं, उनके लाखों काम हैं, न उनकी कोई संज्ञा, न कोई सर्वनाम है! भाषा से ही, भाषा में भी उनका काम तमाम है!

बहुरूपी सच!

अँधे आसमाँ 2

पूरा अधूरा पूरा ही अधूरा हूँ अपना ही धतूरा हूँ सरचढ़ गया तो प्यारा हूँ उतरा तो बेचारा हूँ ताकत है हाथों में इरादों में , नज़र नहीं आती , खुद को भी दिखानी पड़ती है सामने रहें वो लकीरें , बनानी पड़ती हैं , तस्वीरें बनती नहीं ठीक से , मिटानी पड़ती हैं !

तराजू का सामान

इंसाँ होने की कोशिश हज़ार हैं, पर अकेला बेचारा क्या करेगा! सब अपनी शोहरत के सामान हैं बेवजह ही आईने बदनाम हैं हमसे नहीं होता कामयाबी का खेल, वो फिर भी कहते हैं हम इंसान हैं अपनी तस्वीरों के सब गुलाम हैं और हमको लगता है भगवान हैं अगर सच अद्वैत है तो दोगला है मज़हब का नतीजा बड़ा खोखला है घूमते लिख के डिग्री ओ तजुर्बा माथे पर शायद कोई रख्खे की काम का सामान हैं आपकी तराजू आप की मुबारक हम क्यों किसी के काबिल बनें आचरण के दर्ज़ी तमाम हो गए इंसान नापने के काम आम हो गए

ग़ूम, गुमां, गुमनाम!

तमाम मसलें हैं किस-किस को बयां करें, नज़र खुद पर, क्यॊं और क्या गुमां करें ! दर्द अपना है, या कोई भुला हुआ सपना है , आप नहीं समझेंगे आपको अभी चखना है!  कुछ इस तरह से अपनी पहचान होती है , तस्वीरॊं से हकीकतें कुछ गुमनाम होती हैं ! तमाम खेल जिंदगी के हमने भी खेले हैं, सफ़र ज़ारी है, और भरते हुए झोले हैं! ताक लगाये बैठे हैं सब कि कब मामूली होगे, आप कहिये अब इस दुनिया से कैसे निभायें! फ़ुर्सत से बैठे कि फ़ुर्सत कब मिले, बड़ी तस्सली से अब इंतेज़ार चले! खबर हो न हो, मुस्तैद अपनी नज़र है, देखें किस मोड़ आज आपका सफ़र् है हमारा खुदा कोई नहीं, हम फिर भी दुआ करते हैं, मर्ज़ खोजेंगे किसी दिन, चलो पहले दवा करते हैं!

पहचान से दो दो हाथ

मैं अपने दायरों में फिर भी बंधा नहीं, उड़ने के लिए मुझे एक आसमां बहुत है   अपनी आँखों से दुनिया को ख़्वाब दिखाते हैं, आप पानी डालते रहिये हम आग बनाते हैं ये माना गहरे पानी में नहीं आपकी नांव के सवार बैठकर साहिल पर हमने भी किये कुछ शिकार वो और होंगे जो कतार बनाते हैं हम वो नहीं जो गिनतियों में आते हैं, समझदार को सिर्फ एक इशारा है, डूबते को तिनके का सहारा है हो जौहरी को हीरे की पहचान तराशने वाले के हाथों में उसकी जान आपको लगते हैं अगर अब भी अनजान चलिए समझिए यही है हमारी पहचान बंजारों के लिए सफर भी एक मक़ाम होए है, शुक्रगुजार हो दिल जो एक पल भी कोई साथ होये है (१९९७ में नौकरी की तलाश में तैयार अपने पहचान पत्र/Resume से उद्वत)

खुदगर्ज़ मन की दुआ!

गर्मी में बारिश की झलक,  नेक इरादॊं के फलक खुदगर्ज़ मन की दुआ,  कुछ देर तलक,  कुछ देर तलक और चंद  लम्हों तलक, झपक न जाये पलक बिरली सच्चाई है देर उतरेगी हलक  खुदगर्ज़ मन की दुआ,  कुछ देर तलक, कुछ देर तलक   सुन के बादल कि गरज, जाग उठती है ललक  कौन जाने असर दुआ का है,  या मर्ज़ी ए मलक खुदगर्ज़ मन की दुआ,  कुछ देर तलक, कुछ देर तलक  हम अकेले नहीं, कहती है पंछी की चहक सर हलाती हैं जमीं,  भेज मट्टी कि महक खुदगर्ज़ मन की दुआ,  कुछ देर तलक, कुछ देर तलक  कान में बारिश की टिपक, पत्तों पे बुंदों की चमक, हर सांस इशारे से, कहती है ज़रा और बहक खुदगर्ज़ मन की दुआ,  कुछ देर तलक, कुछ देर तलक