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इश्क़ समझ!

इश्क़ इज़हार है, समझदा र को इशारा नहीं, चलते बनिये जो उनको गवारा नहीं, खेलते खुजाते रहें, जिसे ज़ेब में रख्खा तमाशा नहीं,   इश्क़ जज़्बात है, मर्दानगी त्योहार नहीं, और बांट दे वो खुशी से  "हां", उनकी, दिवाली का खील बताशा नहीं! हंसकर बात करते हैं, ये हस्ती है उनकी, खुद को पसंद करते हैं, मुगालते हैं आपके, जो सोचे, आप पर मरते हैं!! इश्क़ साथ है,  दो लोगों की बात है, मिल्कियत नहीं, कोई मेरा हो गया, मान लेना, रिश्तों की नज़ाकत नहीं! इश्क़ सफ़र है, हमसफ़र सी बात है, मंज़िल नहीं, हासिल हो गया, बात ख़त्म, आशिक़ी की तर्ज नहीं! इश्क़ इज़हार है, इंकार है, इसरार है, इम्कान है, आसान नहीं, बात चलती रहे, हर सूरत जज़्बातों का मर्ज़ नहीं!

बा_रतन

  दाढ़ी–टोपी कत्ल कर मन धीर लिया बनाए, फिर बा को रत्न मिले, सबका मन ललचाए, मन ललचाए गुंडन का सो मुंडन लिए कराए ढाई आखर कत्ल का, किए सो लड्डू खाए! लड्डू खाखा घी के गंगा लिए नहाए, दोष अगर कोई है वो पानी पानी हो जाए! पानी कर दिए खून का इतना उसे बहाए, प्रभुवर आईने देख कर चुल्लू पानी जाएं! पानी पानी हुए जो ताला मुंह पे लगाए, रामराज में बोल दिए तो जेल बुलावा आए! जेल हवा खाए जो भी सीधी रीढ़ दिखाए, दंगाई राजा भौंक के पिरजा भेड़ बनाए!

बेवजह सांसे!

  ज़िंदा हूं जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूं, अपनी बेशर्मी में पनाह लिए जा रहा हूं! उम्मीद भी नहीं बची और यकीन भी यतीम है, इस बेबसी को अपनी शमा किए जा रहा हूं! रोशनी भी है और तपिश भी अभी बाकी है, ख़बर नहीं किसको फना किए जा रहा हूं? जाहिर है वो सूरज भी रोशन होगा एक दिन, क्यों हालात को गुमां किए जा रहा हूं? नहीं आना है इस नामाकुल दुनिया में हरगिज़, क्यों फिर इतना पशेमान हुए जा रहा हूं? सिफ़र होने की तमाम कीमतें हैं इस उम्र, क्यों रिश्तों को सामान लिए जा रहा हूं?

गलत हिंद ई!

रम पराम पराम, उठे सबके कदाम, एजी ऐसे गीत जाया करो, अराम हेराम है, शराम बेशराम है, एक ही बज़ रंग हैं सब, और बड़े बदरंग हैं, दंग_आ नियत में रम गया है जैसे, सलाम का गला धड़ से कलम है, जयश्री रम गई है गटर की चकाचौंध में, कीचड़ नराम है सेज बनी सम विधान विषराम है,   अराम हेराम है, शराम बेशराम है, भग, वाह वाह हो रही चहुँ और, दंगआराम है,   समाचार व्यभिचार है, सच्चाई भक्त बनी है धूनी रामाए सारे दुष्कराम ही रम गए है कण कण, रम गए हैं, रम पराम पराम उठे सबके कदाम, योद्धा के सब धंधे हैं, बेसराम के बढ़े चंदे हैं डर से सब गंदे हैं, बदरंगी बंदे हैं! रम पराम पराम, उठे सबके कदाम, अजी ऐसे गीत जाया करो!

कुछ होना है!

"कुछ होना है" खेल है, दुनिया का! आप खिलौना हैं! सच तमाम है,  झूठ बोलते, उसके सामने आप बौना हैं! आप कम है, क्योंकि कोई ज्यादा है, खेल घिनौना है! कंधे किसी के सीढ़ी किसी को कामयाबी भी बोझ ढोना है! तराज़ू किस के, नाप किसका बाज़ार बड़ा है, आप नमूना हैं! रंग फीका है, ऊंचाई टीका है, वज़न ज्यादा कम मुश्किल होना है! "मैं" पहचान, पीड़ा, अभिमान, बड़ी तस्वीर, आप एक कोना हैं!

अपनापन!

हम  उन्हीं आवाज़ों से बात करते हैं , जिन्हें हम खुद सुन सकते हैं , और काया बोलती है , और वो बात करती है , सिर्फ़ , उस देह - ए - दुनिया से , जो उसकी पकड़ में है। और वो अपने आप में एक जहां हो जाती है , गौर करके , कि उसका सरोकार क्या है और ये सीखती है , कि उसे क्या होना है , और क्या लाज़मी है! (डेविड व्हाईट की द  विंटर ऑफ़ लिसनिंग से) From  The Winter of Listening by David Whyte in  The House of Belonging

कायकू?

चलता है वही, जो चलता है, किसका क्या जाता है? बादल सच हुए, बरस बरस के, तरसे तर हो गए! सिसकते पहाड़, मिट्टी पत्थर सरकते, आएं किसके रास्ते? कितना ऊपर पहुंचे, तरक्की तमाम, नीचे गिरें धड़ाम! सभ्यता में जानवर, पालतू, आवारा, जंगल,जंगली नागवारा!! हाइवे लंबे लंबे, दूरियाँ कम करते, गांव के बीच से! रोडोडोन्द्रों (बुरांश) फूल, पैसा वसूल, जो जैसा जहां है! छुप रहे हैं सब? बादल, आसमाँ, पेड़! नज़र या नज़रिया? ठंडा गरम सूरज नरम तुम हम! लंबी चढ़ाई, घुटनों से लड़ाई, खुद पीठ थपथपाई!

अमृता प्रीतम

अपनी ही खामोश समझ को नकार है मर्द को अगर औरत की ताकत से इंकार है! कोई लफ़्ज़ ज़ब ज़ुबां तलक आते हैं, खत्म हो जाते हैं! अगर बचा लिया किसी ने, तो एक कागज़ उतरते है,  और वहीं ढेर हो जाते हैं! रूह पर कुर्बान होने पेश,  लबों से लरज़ते हमारे नाम, एक मुक्कदस आवाज़ बनते हैं! (मुक्कदस - Sacred) ज़रा दूरतलक देखिये, सच्चाई और झूठ के बीच 'जगह' है!  ज़रा खाली! दर्द था, खामोशी से मेंने एक कश सिगरेट के माफ़ि खींच लिया, चंद शेर बचे थे, कुछ कलाम, जो छिटक दिये मेंने राख करके! एक बार एक हीर के अश्क, और 'हीर-रांझा' तुम्हारे, आज हज़ार आँखे रोती है,  बुलाती हूँ तुम्हें, वारिस शाह! (https://en.wikipedia.org/wiki/Ajj_aakhaan_Waris_Shah_nu) कोशिश है कि सुरज किरण बन तुम्हारे रंगों से लिपट जाउं, और जो तस्वीर तुम करते हो, उस में सिमट जाउं! खाक होने के बाद, ज़रा ज़र्रों को समेट एक रेशा बुन कर, बन कर, फ़िर उस छोर तुम्हें मिलुंगी! फ़िर तुम्हारी याद, आई फ़िर आग मेरे ओंठ आई, इश्क़ ज़हर का प्याला सही, मुझे फ़िर भर प्याला ही! बहुत अफ़साने हैं, जो कागज़ नहीं उतरे, वो दर...

मेरे अंदाज़ या अंदाज़न मैं?

सुबह के बाद शाम जब मिलता हूँ खुद से , बड़ा अजनबी सा नज़र आता हूँ !  चलो कुछ नए अंदाज़ करते हैं , दो तीर कैसे तीरंदाज़ करते हैं ?  आज मैं कुछ भी नहीं हूँ , ये शुरुवात अच्छी है !  हम मुफ़्त में बंट रहे हैं , लोग भीड़ से छंट रहे हैं कोई मोल करता है कोई अनमोल करता है जो भी करे ज़माना बहुत तौल करता है ! नए अंदाज़ होने को नए अलफ़ाज़ नाकाफी , रूख बदलो किसी हकीकत का फिर बोलो !  मैं वक्त के हाथों फिसलता जाता हूँ , हूँ वही पर बदलता जाता हूँ !  लड़ते-झगड़ते, बनते-बिगड़ते, संभल जाएँ तो शायरी है!