सताने लगी है शाम अब कम थोड़ी कम आती है याद तेरी, अब कम थोड़ी कम . . . . . . . . जोड़ दिये टुकड़े तेरी तस्वीरों के , नज़र आयेंगे तेरे, अब कम थोड़े कम अब अपने सपनों से परेशां नहीं हम, करवटें लेने लगे अब कम थोड़ी कम अपने ही दर्द अब अज़नबी लगते है अंजाने लगते हैं खुद को कम थोड़े कम पेहरा तेरी यादों पर अब कम थोड़ा कम लगता है खालीपन अब कम थोड़ा कम जिक्र तेरा आये तो मुस्कराते हैं हम, दिलगीरी के जिक्र अब कम थोड़े कम अपने एहसास को आईना किये जो हम तेरे बरबाद लगे अब कम थोड़े कम नयी किताबें हाथों में लिये अब हम, खुद से खुद को करते कम थोड़ा कम
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।