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ज़िन्दगी विशाल!

किनारे, क्या इस पार, क्या उस पार, ज़िंदगी, साथ, रोज़ कोशिश बदलाव, कम और जरूरत अनगिनत कमी अकेले कमज़ोर क्या कितना कब सपने पूरे अधूरे टूटे उस पार थढ़, सर अलग धढ़ दर्द चीख़ अपने सपने टूटे क्या कहां जाने दो ट्रेन आने दो ज़िंदगी

सब हमसफ़र!

ये एक सुबह थी,  कोई एक वजह थी, सब मौजूद दे, ठीक वहीं,  जहां उनकी जरूरत थी, उनको भी, वहां ही होना था, उनकी भी एक वजह थी! रास्ते में सब हमसफ़र हैं! आप क्यों अकेले हैं? हर ओर मेले हैं, ज़िंदगी के ज़िंदगी को आप क्यों रुके हैं? दो कदम चलिए! ज़िंदगी हमसफ़र है!

घुम्मकडियाँ!

इतिहास का इरादा क्या था? यूँ खड़े होकर, सरचढ़ बोलते, अपनी कहानी कहता है या मुँह चिढ़ा रहा है हमको? तुम ने कौन सा तीर मार लिया? अदना बन कर खड़े हो? हमारे साथ सेल्फ़ी लेते, लोग तुम्हें शायद लाइक करें?

अंदेशा...अंदाज़न...अमूमन!

कभीकभार, सवाल, पूछिये, आइनों से, इंतज़ार करिये! कभी यूँ ही, कभीकभार, कभी हांसिल कभी दुश्वार! कभीकभार, एक आहट, एक ख़ामोशी, एक इंतज़ार कभीकभार! कभीकभार, रातदिन और दिनरात, वही ख्याल कभीकभार! कभीकभार, देखलीजे, गौर से, क्या सवाल? कभीकभार, एक सपना एक हकीकत कभीकभार! कभीकभार, सवाल एक, एक ही सवाल, कभीकभार! कभीकभार, रास्ते, एक सवाल, एक मोड़, कभीकभार! कभीकभार एक सवाल और हम कभीकभार! कभीकभार, हम और सफ़र, हमसफ़र, कभीकभार कभीकभार, हरदम, कभीकभार!

मेरे अंदाज़ या अंदाज़न मैं?

सुबह के बाद शाम जब मिलता हूँ खुद से , बड़ा अजनबी सा नज़र आता हूँ !  चलो कुछ नए अंदाज़ करते हैं , दो तीर कैसे तीरंदाज़ करते हैं ?  आज मैं कुछ भी नहीं हूँ , ये शुरुवात अच्छी है !  हम मुफ़्त में बंट रहे हैं , लोग भीड़ से छंट रहे हैं कोई मोल करता है कोई अनमोल करता है जो भी करे ज़माना बहुत तौल करता है ! नए अंदाज़ होने को नए अलफ़ाज़ नाकाफी , रूख बदलो किसी हकीकत का फिर बोलो !  मैं वक्त के हाथों फिसलता जाता हूँ , हूँ वही पर बदलता जाता हूँ !  लड़ते-झगड़ते, बनते-बिगड़ते, संभल जाएँ तो शायरी है!

एक सफ़र मुसाफ़िर होने का!

क्या मैं तैयार हूँ , जाने को , या फ़सा हूँ , अपनी जिंदगी भुनाने को , हाथ आई चीज़ कौन छोड़े , वो भी मुफ़्त की , बहती गंगा में सब हाथ धो रहे हैं , आज़ - कल बड़ी खुशी से खो रहे हैं हालत पतली है , अपने सर न आये , हो कहीं भी पेशी , हो जायेंगे खड़े सर झुकाये! पर वो दिन किस ने देखा है? अभी तो बस इकट्ठे कर लो , दिन पे दिन , साल पे साल , और उपर से ऐंठ कि उम्र बड़ी है , आपको देख कर चली घड़ी है , पर सच की किसको पड़ी है , सब अपनी मंज़िलों के बीमार हैं , क्या मज़ाल कोई कह दे कि जाने को तैयार हैं , सारी मेहनत खुद को बहकाने की , खुदा आपको लंबी उम्र दराज़ करे , जुग - जुग जियो , साल कि दिन हों पचास हज़ार , क्यों नहीं कोई दुआ देता कि आप कि मौत आप को इंतज़ार न कराये , और बोले भी कौन क्योंकि मौत बदनाम है , बेवज़ह , अगर सोचें तो , सच्ची है , ईमानदार है , और सच कहें तो यही है एक जिसको जिंदगी से सच्चा प्यार है , कभी साथ नहीं छोड़ती , मुँह नहीं मोड़ती , खैर जाने दीजिये ,  बात जिंदगी और मौत की नहीं , हमारी है , मेरी है , ...

आसान काम!

जो मालुम है उस पर यकीन रहने दो! अपने सपनों को तुम हसीन रहने दो!! मुश्किलों को अपनी आसान रहने दो! जब तक मैं हुँ , मेरी जान रहने दो!! कब समझे है आईने अंजान रहने दो! अपनी आँखों में ही अपनी शान रहने दो!! मुझको मुझसे ही समझो , बात आसान रहने दो! मेरी गलतियों को तुम मेहमान रहने दो!! छू कर महसूस करो लगे जो दाम रहने दो! जिंदगी को अपनी छलकता जाम रहने दो !! चोट और भी हों , रस्ते का काम रहने दो ! मुझे अपने छालों का बाम रहने दो !!

आईये ! / The Invitation!

मुझे मत बताओ कि जिंदगी कैसे कटती है  ये बताओ कि अंदर से आवाज़ क्या आती है, और क्या वो सपने देखने की हिम्मत तुम में है, जो तुम्हें अपने दिल की तड़प तक ले जायें?  मुझे अपनी उम्र कि लंबाई नहीं बताओ, ये कहो कि मुरख बनने का जोखिम उठा सकते हो? प्यार के लिये, सपनॊं के लिये, जिंदगी जीने के रोमांच के लिये!  क्या फ़रक पड़ता है कि तुम्हारे ग्रहॊं की क्या दशा है ये कहो कि, 'अपनी दुखती रग' पर तुम्हारा हाथ है क्या? जिंदगी की ठोकरॊं ने तुम्हे खुलना सिखाया है? या आने वाले जख्मॊं के ड़र से तुम ने अपनी पीठ फ़ेर ली है? जिंदगी से!  जरा ये बताओ कि दर्द को, मेरे या तुम्हारे, बिना कांटे, छांटे, छुपाए, निपटाये, क्या तुम अपने साथ रख सकती हो? जरा सुनूँ, क्या तुम आनंदित हो, मेरे या तुम्हारे लिये! और क्या झुम सकते हो ऎसी दीवानगी से, कि तुम्हारे हाथ-पैर के छोर हो जायें भाव-भिवोर बिन संभले, बिन समझे, बिन जाने, कि इंसा होने कि हदें होती हैं!  तुम जो कहानी मुझे सुना रहे हो वो सच हो न हो, ये कहो कि खुद का सच होने के लिये, क्या किसी और की नाउम्मीदगी बन सकते हो, और अपनी अंतर...