दिखती नहीं है बारिश पर छू जाती है, चलो वहां रुकें .. सही में कहीं दूर से, जैसे अनजाने सुरूर से, आया कितने गुरुर से, बादल वहीं पे, सबको सरोबर करके हसीं कारोबार करके उदास होते, लम्हों को प्यार करके बारिश है कहीं, हाथ में डोर लिए, अपना सच छाप के, अपना रास्ता नापते, मौसम झट से , कल को छोड़ के, होकर नये मोड़ पे, सब के सच बदलती जमीँ
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।