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मोहब्बत के काम!

मोहब्बत क्यों ये मुश्किल काम है? पहलू में उनके सुकूँ, आराम है! क्यों दुनिया में आशिकी बदनाम है? उनकी शिकायत, ये जरूरी काम है! फिक्र है मेरी ये उनका काम है, ये समझ लेना सफर का नाम है! आपस में दोनों खासे बदनाम हैं, आ गया गुस्सा तो खासे आम है! सब शिकायत है मेरी ख़ामोशी से चुप हैं हम और खासे बदनाम हैं! नज़र जब भी नज़रिया बन जाए, समझ लीजे किसी का काम तमाम है! ज़िंदगी जी रही है ख़ूब दोनों को, हम हैं साकी और वो जाम है! मोहब्बत गहरी पहचान है, सुबह मेरी ओ उनकी शाम है! एक-दूजे को मुश्किल-ए-आसान हैं! चैन भी हैं ओ कभी चैन-ओ-हराम हैं!

कहां जाईए?

कहाँ जाइए? पैरों ज़मीन है, सर आसमान, छत आसरा है, चारदीवारी सहारा, फिर शिकायत क्या, डर क्यों, हर लम्हा बदल रहा है, क्योंकि हवा बह रही है, रगों में खून चल रहा है, मायने हैं ज़िन्दगी के कहीं न कहीं, कुछ न कुछ बदल रहा है! रुकना, ठहरना, स्थिरता किस लिए? के आप समझ पाएं...जाएं चलना ही नियत है, नीयती अच्छा हो आप बनाएं यही नीयत भी! दुनिया चल रही है, एक एक पल, आप रुक कर, कहाँ जाईए? चलिए बताइए? कहाँ जाईए?

सुबह अनकही!

एक सुबह देखी, जागती, भागती, थकी, कहीं आज़ाद, कहीं बोझे से लदी, उम्मीदें और आस लिए, कहीं भूख और आस लिए, कहीं बनती, सँवरती, जोश और होश लिए, कहीं टूटी, बिखरती, हताश ओ रोष लिए, कहीं खुली, कहीं बंधी लड़खड़ाती कहीं सधी, असीमित विस्तार, कहीं मुट्ठी में लाचार, मुमकिन! न? कहाँ आपकी नजर है? क्या आप पर असर है? क्या आपकी कमाई है? क्या सोच चुन आई है? आपकी नज़र, आपका फैसला है? या ज़हन में, चार गूंजते शोर का घोंसला है? क्या आपके सवाल ज़िंदा हैं? या आप अपनी कोशिशों के शर्मिंदा हैं? आप सुबोह को सुन रहे हैं? या फैंसले आपको चुन रहे हैं? "चार नज़र, चौबीस डगर, मुश्किल हर आसान, ता ऊपर आसमान है, ले तू भी कुछ ठान"

बंजारियत!

आज सुबह की दौड़, बेजोड़, नयी शक्ल हर मोड़, और दौड़ ज़िन्दगी, कोई फुर्रर्रर कोई खिरामां खिरामां, सोचने का वक्त नहीं, किसी को, और कोई मगन है ख्यालों में, कोई सेहत के लिए भागता है, और कोई नेमत को, और काफ़ी अपनी कीमत को, और समंदर दूर से, बारीख़ी से, कुछ नहीं कह रहा, अगर आप सुन पाएँ, तो समझेंगे, सच कुछ नहीं है, बस आपकीं राय है!

सच सुबह!

सब खुश हैं, अपनी अपनी जगह पर अपनी अपनी जगह से, फ़िलहाल, इस पल में और फिर सब बदल जायेगा और फिर भी सब खुश हैं, अपनी अपनी जगह पर अपनी अपनी जगह से सूरज बादल आसमान जमीं सारा निसर्ग, सब साथ हैं, अपनी अपनी जगह भी, और उस के साथ बदलते न अटके हैं , न भटके हैं न कोई चिन्ता है, न कोई इंसिक्युरिटी, न खींच-तान, न अपनी जगह का दबदबा, पानी पानी, हवा हवा सब चल रहा है, सब बदल रहा है, बदलने की कोशिश नहीं, क्योंकि बदलना ही ज़िन्दगी है, कोशिश तब जब डर हो, अगर मगर हो, खम्बों में घर हो, और ये गुमाँ कि कुछ मेरा है, "मैं" मालिक, कितनी इंसानों जैसी बात है, आप ही कहिए, इंसान होना कौन बड़ी बात है!??

मुबारक मैं!

इंकार बिल्कुल नहीं है , पर इकरार जबरन न हो , दस्तूरों रिवाजों‌ को हर्गिज़ , मेरी गर्दन न हो , बात हो , साथ हो , हाथ हो , इज़्ज़त लाज़िम हो , सौगात न हो , कोई लेने नहीं आये युँ कि कोई सामान हैं ? कहीं जाना न हो , कि रुखसत मेहमान है दुआ कुबूल है , पर पोते नाती का ये हिसाब अभी फ़िज़ूल है , रंग , कद , वजन का शौक है तो किसी ज़िम में काम ढुंढिये , ये बाज़ार नहीं है कि , पसंद के आम ढुंढिये ! मैं "एज़ इज़ वेहर इज़" हूँ,  सोच समझ लीजिये, दहेज सोच रहे हैं तो मेरी आदतें और मेरी राय , और एक पूरी दुनिया , मेरे दोस्तों की दोस्ती साथ लाउंगी मैं आसान हूँ , इस की गारंटी नहीं , हाँ पर मेरे दोस्त कभी मुझसे बोर नहीं होते ! कहिये कबूल है ? अगर इरादे नेक हैं साथ चलिये , रास्ते मिलिये न मैं तुम को बदलूंगी , न आप मुझे बदलिये अगर ये देख - सुन , आप मुस्करा रहे हैं , तो मैं आप को मुबारक हुँ ! वर्ना पलक झपकिये, मैं नदारत हूँ, (दुधो नहाओ पूतो फ़लो, और भेड़ की चाल चलो)  मेरे दोस्तों, साथियों और उन सभी लड़कियों को समर्पित जो दुनिया की सेहत को बेहतर बनाने में लग...

ये क्या दौर है?

ये भी एक दौर है और वो भी... सच बदल जाते हैं, इरादों का क्या कहें? जहर खुराक बन गयी है जुबाँ नश्तर ये भी एक दौर है आसमाँ नयी ज़मीन है, सर के बल चाल है,  पैर नया सामान हैं ये भी एक दौर है मौसम कमरों के अंदर सुहाना है, ताज़ी हवा अब छुटटी बनी है बड़ा छिछोरा दौर है खूबसूरती अब रंग है, सेहत पैमानाबंद है ये तंगनज़र दौर है आज़ादी क्रेडिट कार्ड है सच्चाई फुल पेज़ इश्तेहार है ये बाज़ारू दौर है मोहब्बत सेल्फ़ी बन गयी है ज़ज्बात ई-मोज़ी हैं तन्हाई अब शोर है ये मशीनी दौर है सब कुछ तय चाहिए न खत्म होता डर चाहिए चौबीस सात खबर चाहिए बड़ा कमज़ोर दौर है भगवान अब फसाद है, मज़हब मवाद है, कड़वा स्वाद है इस दौर का ये तौर है  

अपवादी आवाज़ें

एक और अज़नबी रात सिरहाने खड़ी है, एक और नामुराद दिन मुंह बायें खड़ा है, ना कोई उम्मीद नाउम्मीद हुई है, ना कोई संजीदगी बेगुमां कोई तकलीफ़ अभी तक उदास है, प्यास अभी भी मायुस नही हुई, ना दर्द गुमराह हुए हैं एक हंसी है जो कंहीं अकेली पड़ी है, होँसले बेफ़िकरे खड़े हैं, रास्ते खुद को ही सब्र की दाद देते हैं और मोड़, बेचैनी में बढे हैं, कुलजमां सब वही है, क्या नया हो, जो कुछ गुजरा नहीं है, और क्या पुराना, पहचाने, सब अजनबी हैं कहने को कुछ नहीं है, गालिबन, जो लिखा वो सही है!

हालात

क्यों टूटे हुए हालात हैं, क्यों यतीम सवालात हैं मैं खुद को देख नहीं पा रहा, या मेरी पहचान बदल गयी है, या कोई हक़ीकत है, जो  खल गयी है,  ये आइनों की कोई साज़िश है , या मेरे पैरों के नीचे जमीन बदल गयी है, हर दिन मेरी करवटें मुझे बदल रही हैं, पंख तो उग आये हैं, पर आसमान नहीं नज़र आता, इस सफ़र का सामान गुम है, सच कहूँ, तो गुमसुम! और साथ किसका है, फ़ैंसले सारे मेरे हैं, फ़िर भी, तस्वीर के रंग मुझे छल रहे हैं, मैं रास्ता बदलता हुँ, या रास्ते मुझे बदल रहे हैं?

ऊंट की करवट, रंगे गिरगिट, तमाम गिटपिट, that's it!

रात आई है, और दिन को खबर करते हैं, कौन जाने मुट्ठी में कितने लम्हे बचे हैं, मेरे हालात मेरे होने को असर करते हैं शरमाते हैं, भरमाते हैं, आइना देखने से कतराते हैं, सवाल भी बेशरम हैं, रह रह कर सर उठाते हैं, एक और रात हो गयी, खुद को नज़र ना आ सका, फिर भी अपने साथ हूँ, कुछ खास हूँ, या खाक हूँ  ऊँट को बैठना ही है किसी करवट तो बैठेगा, भावनाएं दबाए रहिये, दिल किसी दिन ऐठेंगा ! कल किस करवट बैठेगा, 'आज' ये सोच कर ऐंठा है, शफक पर एड़ियों खड़ा है, कैसा चिकना घड़ा है? युँ गुम होने के लिये जगह कहाँ लगती है मेरे होने से ही तस्वीर बदलती है तस्वीर में रहुं पर नज़र् ना आयुं ये बात अपने रंगों को कैसे समझाऊं मेरे फलक, मेरे खुदा, कहाँ आपसे हैं ज्यादा जुदा ! नवाज़िश आपकी,रवायत खाक की, यही हैं मेरी दवा. आप देख सकते तो कहते रौशनी की कमी नहीं, नज़र आने के लिये फ़िलहाल दूसरी जमीन नहीं ! आप दौड़ते हैं, और खुद को पीछे छोड़ते हैं इंसान होना भूल गए? क्यों पीठ मोड़ते हैं? आँखों का अँधेरा गर रात हो जाये ख़ामोशी से ही सारी बात हो जाये