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मैं ना मर्द!

 मैं एक का था और वो २५ की,  नज़दीकी मैंने तभी सीखी,  मैं पाँच का था और  वो उन्तीस की,  तब पता चला कि किसी को जीतने के लिये, किसी को हारना पड़ता है,  इंसान बनने की यही शुरुवात थी मैं पन्द्रह का था और वो अठाहरा की,  वो आगे रहती थी,  अपने यकीनों पर जीती थी मर्द नहीं बनने की मेरी यही शुरुवात थी मैं इक्कीस का था वो चौबीस की थी,  आंटा माड़ना, रोटी गोलना और  ज़िंदगी के पापड़ बेलना  तब मैनें देखा था,  काम का कोई लिंग नहीं होता,  ये समझ यकीन बनने की ये शुरुवात थी मैं तेईस का था और वो सब २०, २१, २२ की रोज की बातें, नये सच से मुलाकातें, होमोसेपियन से आगे जँहा और भी हैं,  कंधों को मिलाना मैंने यहीं सीखा था, ये मेरी नज़ाकत की शुरुवात थी मैं छब्बीस का था और वो चौबीस की,  उसको रोमांच था और मैं तो था ही,  मैं सोच था वो यकीन थी, जितनी ज़हीन उतनी हसीन, अपने आप में तय,   साथ से अलग, लिये अपने फ़लक, मेरी दुनिया की पहली औरत,  जिसे संपूर्ण होने के लिये मां ...