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रोशन समंदर!

तमाम अँधेरे, तिनका तिनका रोशन कोने, उम्मीदों को तकिया, इरादों को बिछोने, बस यही है सब कुछ, और जो बाकी है वो आज़ाद मर्ज़ी, फ्री विल, कोशिश और कशिश, हमसफ़र बनते हैं, कभी कोशिश रास्ता, कभी कशिश साहिल, बेबसी ज़ाहिल, सब नज़र है, कहाँ, किसको क्या, असर है, ज़द्दोज़हद जिगर है, और ज़िरह भी, हालात से, खारिज़, आप जी सकते हैं, शर्तों पर, अपनी, जी भर के!

पल पल समंदर

कहाँ से उठी ओ कहाँ जाएगी, ये सुबह, फैलती सिमटती ये जगह, मिलती बिछड़ती कोई वजह भाग रही है, या जाग रही है, नज़र, समा रही है या समेटे हुए, रेत, मिटती है या लिपटती है, लहर, अकेले है या साथ के जश्न की, पहचान, तमाम है, और हर पल तमाम भी, सच यकीं भी है ये और गुमाँ भी, ज़िन्दगी, है? इस पल, और कल?

निसर्ग गौरव!

अपने आप में समय को समाये हुए धरा पर हम सब से ज्यादा जीवित दानवी आकार आकाश को असीमित करती हुई उँचाई और प्राकृतिक विविधा का परिचय देती चौड़ाई साथ खड़े रेड़वुड़ वृक्षॊं के बीच अपनी वरिष्ठता का परिचय देती सब के उपर छायी हुयी , और वृक्षॊं को कभी आग ने भी छूआ था पर इसके उपर कोई निशान ही नहीं इतिहास की सारी काली परछाइयॊं के पार कितने युध्ध कितनी ही मानवी बेशर्मियॊं और दुखॊं के परे आकाशी आग को गहे जमीनी आग को सहे कितने आंधी - तुफ़ानॊं को धराशायी कर अनछुयी , राजसी , अलग एकदम अकेली गौरवपुर्ण ! (जे. कृष्णमूर्ति की पर्यावरण सोच से निचोड़ी एक अभिव्यक्ति)