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जमूरा जम्हूरियत का!!

चौकीदार - ए जमूरा जमूरा - जी चौकीदार चौकीदार - बोलेगा जमूरा - बोलेगा चौकीदार चौकीदार - जो बोलेंगे वो सोचेगा जमूरा - जी चौकीदार चौकीदार - तोता बनेगा जमूरा - जी चौकीदार चौकीदार - बंदरी बदरंगी बनेगा जमूरा - जी चौकीदार चौकीदार - जो भेजेंगे वो पड़ेगा जमूरा - जी चौकीदार...फॉरवर्ड भी करेगा चौकीदार - सवाल पूछेगा, जमूरा - जी चौकीदार सरकार - क्या ?(थप्पड़, घूंसा, लात) सरकार - सवाल पूछेगा  जनता - नहीं सरकार सरकार - सवाल सोचेगा  जनता - नहीं सरकार सरकार - बोल जंग जनता - जंग जंग जंग सरकार - वार  जनता - वार वार वार सरकार - मार डालो  जनता - मार डालो मार डालो!

बहुत दूर की बात!

इंसानियत का दूरियों से गहरा नाता है, मणिपुर दूर है, गाज़ा नजर नहीं आता!    औरत की इज्ज़त बहुत जरूरी होती है, पर जंग की अपनी मजबूरी होती है!! बच्चे वैसे तो सारे ही भगवान हैं, पर गाज़ा में तो सब "मुस्लमान" हैं? आसमान से खाना, खाने पर बमबारी, नफ़रत हद पार तो बन गई बीमारी! मणिपुर और गाज़ा दोनो ही ख़बर नहीं हैं, कब्र हैं तमाम किसको फिकर नहीं है! सच नंगा है ऊपर से मर्दानगी का धंधा है, इज्ज़त लूट रही है और बाकी हाल चंगा है! शराफत का इस दौर में न करो तकाज़ा आप के कोई नहीं जो निकला जनाजा! खबरें वो होती हैं जो सच बताएं, सच वो है जो सरकार बताएं! सरकार शातिर है, झूठ बोलती है, क्या है आज की ताजा खबर ? बताएं ?

ऑक्सीजन!

 .......(फूलती साँसे)  ........हाँफते हाँफते एम्बुलेंस....?  रिक्शा, ठेला....जो मिल जाए सो! अस्पताल इंतज़ार, लंबी लाइन कागजात ऑक्सीजन ऑक्सिजन ऑक्सीजन ........ (खामोशी) .........(कोई जवाब नहीं) ..........(अबकी बार, इंतज़ार) ऑक्सीजन ऑक्सिजन ऑक्सीजन सरकार कहाँ है?  ओह! चुनाव रैली!! , अरे "A" को ऑक्सीजन चाहिए (ट्विटर पर x) अच्छा में पूछता हूँ, (ट्विटर पर Y) Y (व्हाट्सअप ग्रुप में)  अरे! "A" को ऑक्सीजन चाहिए XYZ,  पूछो, बताओ, पता करो, (व्हाट्सएप, टिवटर, फेसबुक, इंस्टा) हां मिला! उसको बताओ, कनेक्ट कराओ,  वहां पहुंचाओ!! ऑक्सीजन ऑक्सिजन ऑक्सीजन हां मिल गया हां मिल गया हां मिल गया  हां मिल गया हां मिल गया.... 1. अब शायद बच जाए! 2. बच गए! 3. हस्पताल में बिस्तर नहीं है! 4. मिल गया, पर अब देर हो गयी! 5. अब ऑक्सीजन नहीं, क्रियाकर्म करवा दीजिए! ..... अब की बार, अंतिम संस्कार!!

दिशा और दशा!

क्या इस देश की दशा हो गई है क्या इस देश की दिशा हो गई है? ताकत तो हमेशा से ही नशा थी, अब अवाम की सज़ा हो गई है! सोचो मत, बोलो मत, देखो मत, देशप्रेम की ये इल्तज़ा हो गई है! खामोशियाँ बहरा न कर दे सबको, कुछ ऐसी आजकल हवा हो गई है! बहका दो नफ़रत से या चुप कर दो, नौजवानी जैसे कोई सज़ा हो गई है! इस दौर कोई भी मासूम कैसे हो? मुख़ालिफ़त ही गुनाह हो गई है! बस? अपनी अपनी सोच के सब क़ाबिल, राय मेरी, सच की जगह हो गई है!

गूंजती खामोशियाँ!

सब खामोश हैं कोई सुन नहीं सकता? दर्द सारे मज़हबी रंगों में बिकने लगे हैं! बेख़बर अपने खंजरों से, इतने मासूम हैं सारे दोष शिकार के, ऐसे गुनहगार हैं!  किस किस क़त्ल पर भगवान का नाम है, बस एक मत्था टेका के सौ खून माफ हैं! इतनी चुप्पी है या कान के पर्दे फट गए? इतने घिनौने सच, सब धर्म जात में बंट गए! नफ़रत माफ, झूठ माफ, सरेआम कत्ल माफ़? अपने धर्म की शिक्षा सबको कितनी साफ है! घर बैठे हर एक गुनाह की वकालत करते हैं, आंखों पर पट्टी बांध सब इबादत करते हैं! अपनी कमियों ने कितना कमजोर किया है,  इलाज़ ये कि किस किस को दोष दिया है? यूँ नहीं की शहर के सारे आईने ख़ामोश हैं!  किसके हाथों बिक रहे हैं, ये किसको होश है? ज़ुल्मतों की कमी नहीं, और रोशनी कातिल है, किसको इल्ज़ाम दे के अपने ही सब शामिल हैं! (ज़ुल्मतें - अँधेरे)

हम सरकार!

टिकटोक पर बैन है! व्हाट्सएप से चैन है? पेटीएम फ़िर कैसा है? पीएम केयर में पैसा है? हाथ धोए पीछे पड़े खासे चिकने घड़े, खोखले भाषण सब, क्या कीजिएगा अब? मुफ़्त में राशन देंगे,                                                                                                                  योगा के आसन देंगे, झुठ आश्वासन देंगे, सवाल न होने देंगे! देश की सरकार है बात ये बेकार है, इंतज़ार करते मदद का, लाखों लाचार हैं! बात बढ-चढ कर बोलना, बीमारी मज़हब से तोल ना नफ़रत को भक्ति बोलना सत्ता के खेल हैं! सरपरस्त लकीर के फ़क़ीर हैं, कहाँ किसी के ज़मीर हैं, खून चूस मज़लूम का कामयाब सब अमीर हैं! ये कैसे हालात हैं,              ...

बेकार सरकार

(नागरिकता कानून, दिल्ली चुनाव और दंगे) नफ़रत के व्यवहार, अब सरकारी हथियार हैं, गद्दी पर बैठ मज़े लूटें, अब ऐसे जिम्मेदार हैं! (लॉकडाउन और मजदूूूर, मज़लूूूम) परवा नहीं मज़लूम की, कैसे ये हमदर्द हैं? मुँह फेर कर बैठे है, जो 56 इंच के मर्द हैं! जो सामने है वो झूठ है, सच! बस मन की बात है! लूट गई दुनिया लाखों की, ख़बर है, 'सब चंगा सी'!! (ऊपर से ताली, थाली, दिया) दिखावा है, भुलावा है, जो सरकारी दावा है, ताकत का नशा है और चौंधियाता तमाशा है! सरकार सर्वेसर्वा है, सर्वत्र, सरसवार, जिम्मेदारी की बात करी तो, छूमंतर, उड़न छू, ओझल! हज़ारों जंग हैं और लाखों लड़ रहे हैं,  सरकारी रवैये के ज़ख़्म से मर रहे हैं! सब ठीक है, कुछ भी गड़बड़ नहीं, बॉर्डर पर कबड्डी कबड्डी खेल रहे हैं? अपनी टीम के 20 गंवाए? ये किसकी तरफ से खेल रहे हैं? चश्मा बदला है या नीयत बदल गयी है, या हमेशा की तरह जुबान फिसल गई है? हर तरफ पहरे हैं, क्या राज ऐसे गहरे हैं? गुनाह छुपाने वो तानाशाह हुए जाते हैं!

करें तो करें क्या?

करें तो क्या करें? शर्म से मुँह छुपाएं या सिर्फ मास्क करें? भूख प्यास करें, उम्मीद आस करे , ठंडी आह भरें या लंबी सांस करें? सरकार निकम्मी है, कब एहसास करें? शिकवा शिकायत करें, या बस इबादत करें, हाथ जोड़ें या हाथ पर हाथ धरें? चीखें, चिल्लाएं,  भिखारी बनें या जनावर, सिर्फ़ लानत धरें? या गुस्से को धार करें? बच गए किसी तरह, किसी तरह गांव पहुंचे, टूटे हौंसले जोड़ें या छूटा जो सामान करें? कुछ समझ नहीं आया, कोई ख़बर नहीं, कोई मदद नहीं, फिर भी हाथ जोड़ें या सवाल सरकार करें मर गए बीच रस्ते, बेआबरू होकर, उनके पीछे छुटे बच्चे, माँ, बाप  करें तो क्या करें? आपका दिलासा, सहानुभूति, चिंता आग में घी का काम करे! आपने अपने आइनों से कब क्या सवाल करे?

ये कैसी सरकार!

आत्मनिर्भर मजदूर    घर से दूर, अपने पैरों चले हैं, सरकारी फैंसले हैं? ये कैसा सरकारी खेल है, कमजोर है वो फेल है? महंगी बड़ी रेल है, सवालों को जेल है? जाको मारे सरकारी नीती,  राख हवा में होई, कदम कदम चल मरेगा,  चाहे मदद जग होई! लोकतंत्र पर लॉकडाउन, ये कैसी सरकार हुई? मजलूमों से आँख फ़ेरती  क्यों ऐसी नाकार हुई? वादे ईरादे हैं क्या?  या सिर्फ़ बातें हैं? नीयत साफ़ नहीं,  एक यही सच बचा है! मज़बूरी को बिसात पर चाल बनाते हैं, बड़े बेगैरत हैं जो सरकार चलाते हैं! सरकार ने अपने को बचा कर रखा है, खुद से ही बस अच्छे दिन का वादा है!! मूरख सी सरकार है,  कुछ कहना बेकार है! भूखे को इज्ज़त नहीं,  हालात-ए-ज़ार है! चलिए कुछ दान करते हैं, ख़ुद को ज़रा महान करते हैं! सवाल पूछने का वक़्त नहीं, सर-आंखों सरकारी फरमान करते हैं!

सरकारी सरकार!

सब व्यवस्था सरकारी है, सारा इंतजाम  परदेश से घर लाए जहाज सरकारी थे, और मज़दूर चढ़ नहीं पाए वो बस ट्रेन सरकारी है भूख सरकारी नहीं है, डर और चिंता भी! लोकडाउन सरकारी है, बीमारी सरकारी है!! सड़क सरकारी है, चलने वाले नहीं, मरने वाले रास्ते में अपनी मौत मरे हैं! मरने वालों की लिस्ट सरकारी है, हस्पताल सरकारी है, डॉक्टर नर्स भी, जो शिकायत कर रहे हैं, वो उनकी निज़ी बात है, जिस कमी की बात है, वो कमी सरकारी है, आपसे मतलब? सूचना सरकारी है, जानकारी सरकारी है, उसके अलावा कोई कुछ कहे, तो जेल सरकारी है, पुलिस सरकारी है, उनके डंडे सरकारी हैं, डंडों के निशान आपके, चोट का दर्द आपका, जो गालियां आपने खाईं, वो सिपाही की थीं, पर उनका गुस्सा सरकारी है! कानून सरकारी है, सुप्रीम कोर्ट के जज सरकारी हैं, फैंसले सरकारी हैं, आपको अगर गलत लगें तो, आपकी अपनी राय है, आपकी मन की बात, दो कौड़ी की नहीं, सरकार जो कहे, गलत या सही, वो बात सरकारी है! सरकार माई-बाप है,

कोरोना बहके बहकाए!

कहते हैं आपदा बड़ी है, जरुरत सब साथ आएं, हाथ बटाएं, जुगत बिठाएं, कोरोना से बचें-बचाएं,  और फ़िर शुरू तमाशा,  काम की बात गुल,  मार्च अप्रैल फ़ूल- पुरा बीमारी के साथ, बेचारी से मौत डॉक्टर नर्स बिना जरूरी सामान ताली सुन कर चलाओ काम! जो बीत गई सो बात गई, बड़ी रोशन कल की रात गई, जोश जुनून जज़्बात गई, समझ को जैसे लात गई, भुल सब हालात गई, कोरोना को कहते मात गई? सोच भी जल गई, इरादे भी जल गए, फिर रोशनी की आड़ में, अंधेरों से मिल गए, भीड़ में निकल गए! ज़िंदगी जी रही है बंद कमरों में, मौत सड़कों पर मजदूर चर रही है! टीवी पर देखिए आराम से खबरें, नफ़रत आपकी रगों में पसर रही है! बंद हैं सब चारदीवारी में, वो सच जिनको आवाज़ नहीं, मासूम जिनकी परवाज़ नहीं, गालियां, थप्पड़, चीख़, दया की भीख, दस नौ आठ , दस नौ एक (10 दिन के लॉक डाउन में लगभग एक लाख फ़ोन  (1098-चाइल्डलाइन, 1091 महिला हेल्पलाईन) आए,  बच्चों और महिला को हिंसा से बचाने के लिए ) खबर सारी हिंदू भई, कुत्तन सा सोर मचाई, तबलीकी, तबलीकी बोल कान सबई ...

तालाबंद अक्लमंद!!

मीलों थके पाँव अवाम चला है, बेशर्म भारत का नया नाम चला है! छोड़ दिया अपने हाल पर मरने, घर बैठ सुनते हैं सब काम चला है! शर्मसारः कितने आ गए मदद करने, बस किसी तरह से ये काम चला है! मर गए सड़कों पर कितने लोग, समझे? यूँ बीमारी से बचने का काम चला है! बदतरी का सलूक, दर दर भटकते से बस एक माफ़ी से उनका काम चला है! हुकम चला, लाठी ओ फरमान चला है इज़्ज़त से कहां कोई काम चला है? बिठा दिया बीच सड़क छिड़कने को दवा, और पाँच सितारा किसी का इंतज़ाम चला है? राम के कारनामे और किशन के प्रपंच, एकलव्य का अब भी काम तमाम चला है! कर दिया एलान घर बैठने का अचानक बेघर तभी से तले आसमान चला है! घर बैठे ताली मारते बड़े बेशर्म हैं आप, क़यामत इस मुल्क का अंजाम चला है!!