कारवां कितने मासूम सफर मोहताज़ हैं, हिफाज़त के कैसे देखेंगे अंजान , आँखों पर पर्दों कि आदत के ! गुलामी के दौर हैं चलो यही जश्न करें , सुनने को कान नहीं हैं, क्या प्रश्न करें? कवायत जारी है , दो कदम चले चलो , ताक में रखो सोच , हाथ बस मले चलो ! लेकर काँरवां चले थे , रह गयी बस रहगुज़र , कसर साथ में रह गयी , या साथ का ये असर ! तन्हाई सवाल बचपन के लिये सफ़र करते हैं , कुछ लोग ऐसे हैं ता - उम्र असर करते हैं ! किसको माफ़ करें , कहां मलहम लगायें , नस्ल कौन सी हो , फ़सल कहां उगायें ? जामा पहनते हैं दिखावट का , खुद ही खुद को मंजुर नहीं हैं , इश्क़ तो तमाम करते है , गोया मोहब्बत का शऊर नही है ! आखिर कब तक हमें इंसां होने का फ़कर होगा , हरकतों पर झुके सर , कब ऐसा जिगर होगा ?
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।