रंग हर एक को, एक जैसे नज़र नहीं आते, खाली पेट फ़ीके रंग, भरी ज़ेब चटक जाते! खुद से आप किस ज़ुबान में बोलते हैं, थपथपाते हैं पीठ या हमेशा तौलते हैं? सुनते हैं, क्या, चुनते हैं, अनसुना करते है! युँ भी हम सोच का तानाबाना बुनते हैं!! दुनियादारी ज़ंजीर है गुलामी की, समझदारी वो जो आज़ाद रखे, एक ही तरीके सब के बात मशीनी है, बात वो जो आपको बेबाक रखे! खुद को कम करने के हज़ार नुस्खे हैं, बाज़ार भरे हुए हैं बदलते रंगों से! कुछ चाह कर बदलते हैं, कुछ आह कर, कराह कर कुछ न बदले बदलते हैं, की दुनिया उनकी बदल गई! शाबाशी दे कर गिरफ़्त में लेती है, ईनाम में जो मज़ा है, एक तरह की सज़ा है, लगाम पर आपकी हाथ किसका है? आप की दुनिया क्या, किस दुनिया के आप, आपके हैं दायरे या, किन्हीं दायरों में आप!
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।