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आज़ादी के गुलाम!

किसकी मज़ाल की आज़ादी पर सवाल करे, पुलिस, अफसर, जज, पत्रकार सब साथ हैं! कश्मीर से आज़ाद हैं? कश्मीर में आज़ाद हैं?  कश्मीर के आज़ाद हैं? या क्या फ़र्क पड़ता है? भारत की सरकार आज पूरी आज़ाद है,  जिम्मेदारी से, जवाबदेही से, रामकृपा! ऐसी भी क्या आज़ादी के ख़ामोश बैठे हैं,  सब जानते समझते बोलती बंद हो गई? सुप्रीम कोर्ट के जज हैं, या कोई दरबारी?  किस को न्याय है किसकी तरफ़दारी? सहूलियत की जंजीरें कैसे तोड़ दें,  आज़ादी के लिए कैसे मस्ती छोड़ दें! खामोशी आज़ाद है, सवालों को कैद है,  क़ातिल आज़ाद है बेगुनाह सूली चढ़ें! चुप रहिए कि आप आज़ाद हैं,  बोलने वाले सब बरबाद हैं!

सच कहानी!

बात पुरानी है, सच में कही, अब कहानी है, जिस को नज़र आ गयी, उसकी जानी है, मानी है, दूसरों को 'maybe'! बेमानी है! तो आखिर सच है क्या? अनिभिज्ञ, अंजान, अजनबी? अनदेखी, कैसे मानें, फ़िर भी, सब यकीन खुदा हैं? कही-सुनी, बात पुरानी, कहने को सब की जानी, या सिर्फ़ मानी, बेमानी! सच्चाइयां नहीं समाती दुनिया के दिए पैमानों में, जो कह रहे हैं दिलोदिमाग, और ज़ज्बात उनके शब्द नहीं बने, तो जो है वही कहना होगा, सच हज़म नहीं होता, वो किस्सा कहना होगा!

आवाज़ें!

चलिए सबसे प्यार करें नफ़रत से इंकार करें पूंजीवाद के बाजारों ने नाप तौल सब इंसानों को कम ज्यादा में बांटा है बड़ी चमक इन बाजारों ने "है", "नहीं है" में छांटा है! जहन में कब्ज़ा करती इस बदनियती को बर्बाद करें चलो! फिर प्यार करें! करने को हैं लाखों काम, हज़ार बातें,  सच तलाशना,  सवाल पूछना,  आवाज़ उठाना,  उनके लिए, जिनको खामोश किया है,  समाज ने, संस्कृति ने,  विकास ने, सरहदों ने,  जो जमीन पर है  ज़हन में भी! आईना हैं हम, दुनिया का, और सब अच्छे-बुरे का, जो नज़र आता है दूसरों में, गुण, दोष, और हर एक शख्स हमारा आईना है, हमारे किए का, और हमारी आवाज़ खामोशी है, किसी की! कहिए क्या कहना है, और गौर से ख़ुद को सुन लेना! और खेल है सब,  जो खेल रहे हैं,  अंजाने होकर,  कम ज्यादा होते,  ख़ुद में ही, खुद को,  ढूंढते, खोते,  जो कम करता है,  उसी को ढूंढते हैं,  जो ज्यादा है,  उसे ही बचाते हैं?  अपने ही डर से,  कैसे ये नाते हैं? फ़िर भी, यही दुनिया है, यहीं रोज़ हमारे हाथ गुजरती, पूछती हमसे क्या तुम्हारे उसूल ...

बनते बिगड़ते

आग के समंदर है बाहर हैं अंदर हैं, अपने ही सच के राख हुए जाते हैं! नज़दीक से देखी खुद की खुदगर्ज़ी, अपने ही आइनों के ख़ाक हुए जाते हैं! मौत के सामने अंजाम की परवा करें? चलो आज सब बेबाक हुए जाते हैं! ऊंच-नीच, कम-ज्यादा, बड़ा ओ बेहतर, अपनी लकीरों के सब चाक हुए जाते हैं! फेसबुक, इंस्टा, ट्विटर पर सारे नुस्खे, हकीम सारे फ़कत अल्फ़ाज़ हुए जाते हैं! अपनी ही सरकार की सब बदसलूकी है, अब तो कहिए नासाज़ हुए जाते हैं? हाँ तो हाँ, न तो न, यही रट लगी है, किसकी कमजोरी के ताज हुए जाते हैं? सवाल पूछना गद्दारी का सबब है, गुनाह सरकार के राज हुए जाते हैं! सारी कमियों की तोहमत तारीख़ पर, कितने कमज़ोर हम आज हुए जाते हैं? परेशां नहीं करती आज की सच्चाईयाँ? आप क्यों इतने नज़रअंदाज़ हुए जाते हैं?  बरबाद हो रहे हैं कितने नेक इरादे कातिल उनके आबाद हुए जाते हैं?

आज़ादी के नंग?

आज़ादी का ऐसा नशा के जंज़ीरें नहीं दिखतीं, तस्वीरों से खुश हैं सब, फूटी तकदीरें नहीं दिखतीं! तमाम फ़कीरी मज़हबी लकीरों में सिमटी है, उसूलों की किसी को गऱीबी नहीं दिखती? 60 बच्चे चंद हो गए, ज़हन ऐसे गन्द हो गए? चीख़ रहे हैं सब ख़बरी ऐसे, कि हम अपनी बोलती के बंद हो गए? एक क़ातिल, एक उठाईगीर को रहनुमा किया, क्यों हम इतने अक्लमंद हो गए? अपने ही पड़ोसी पर शक है, क्यों मोहब्बत पर नफऱत के पैबंद हो गए? जो हमराय नहीं होता वो रक़ीब है,  कब से सोच के हम इतने तंग हो गए? ये कैसी आज़ादी आयी,  सब के सब रज़ामंद हो गए? शोर मचाओ, वंदे गाओ, आज़ादी के सब नंग हो गए? ......  बेहरेहाल आज़ादी मुबारक़ हो अगर आप आज़ाद हैं!! #फ्री #आज़ादी #स्वतंत्रता #freedom #independance

जज़्बाती ज़मीन

 ज़मीन हिल गयी,  पैरों के नीचे की  सच्चाई बदल गयी,  कुछ लम्हा सही,  रगों की नीयत बदल गयी,  कुछ कह रही थी,  या सबर टूटा कि  बरसों से सह रही थी! जमीन पिघल गयी, ज़ज़्बातों की झड़ी, रह गयी अनकही कोई बात कसर है, या कही नहीं अपनी, बरसों का असर है? हिल गयी, पिघल गयी, आज ज़मीन आसमाँ निगल गई! ये कैसी प्यास थी, या बरसों से दबी आस थी, ओ आज बदहवास थी? ख़ामोशी अच्छी है, सिर्फ़ सुनने को, 'कहने को' खामोश क्यों करिए? जब भी, जो भी, दिल कहता है कहिए! जुड़िए अपनी जमीं से, जज़्बाती रहिए, ज़ज़्बात कहिए!

देशद्रोही कहीं के!

हेलो  . . .  माईक टेस्टिग . . . हेलो चेक चेक चेक हेलो हेलो चेकिंग देशद्रोही चेक चेक   देश गहरे संकट में है,  चारों तरफ़ से खतरे के बादल मंडरा रहे हैं, खबर आयी है कि देश में देशद्रोही बड़ गये हैं,  कोई भी शक के दायरे से बाहर नहीं है,  आप मासूम नहीं सिर्फ़ इसलिये  कि आपकी कोई राय नहीं‌ है! अगर आपको देश से प्यार है,  तो मान कर चलिये हर कोई गद्दार है,  सरकार ने एक पत्रा फ़ॉर्मूला निकाला है,  बोलो, "भारत माँ की . . ." अगर नहीं बोल पाए तो आप देशद्रोही!  और अब तो देशभक्त होना भी आसान है,  एक झंड़ा और एक डंड़ा,  हाथ में रखिये,  झंड़ा उँचा रहे तुम्हारा, फ़िर जी चाहे उसको मारा, वंदे-मातरम का जोर नारा,  और माँ-बहन की गाली का सहारा,  देशभक्ति के लिये इतना तो वाज़िब है,  वैसे भी वेदों में कहा है,  जैसे को तैसा, खून का बदला खून से, भरम करो, करम की चिंता मत करो, और साथ ही, कुरान में,  क्षमा कीजिये, पुराण में लिखा है,  हिंसा परमो धर्मा,  उठा त्रिशूल मत शरमा!   ...

बदलते लम्हे!

छटपटाते लफ्ज़, जब हलक से निकलते हैं, चहक जाते हैं, महक जाते हैं, कभी बहक जाते हैं, कुछ असर होते हैं, कुछ कसर रहते हैं आज़ादी के ऐसे ही सफ़र रहते हैं! उम्मीद रास्तों से,  सफ़र को मंज़ूर कहाँ हैं, अधूरे रहे मुसाफ़िर,  और हर ओर मकां हैं! अरमानों की आग पर होंसलों को सेंकिये, कोशिशों के हथौड़े, जब जोर से पड़ेंगे, फ़िर रास्ते मन-माफ़िक मुड़ेंगे हाल से, हालात से, रुठे हुए सवालात से, किसका जिक्र करें? और किस माइका लाल से? घड़ियां चुराते हैं दिन से,  कि चंद लम्हे हाथ आयेंगे आप के हाथ में रख्खे हैं  हाथों से फ़िसल जायेंगे!  आप के हाथ में रखा है हाथ कि संभल जायेंगे, घड़ियां चुराते हैं दिन से,  कब चंद लम्हे हाथ आयेंगे! काबिल हैं मौसम,और हालात भी मेहरबान हैं, कुछ दिन जिंदगी कितनी आसान है, आपके सफ़र में अगर अब भी जान है, याद रहे सारी मुश्किलों को शमशान है! कितने यकीं हैं सामने किसको आसमान करें रास्ते मिल जायेंगे, साथ, कौनसा सामान करें?

लापता रंग!

कहते हैं आज़ाद है, सुनाई देता है, फ़िर क्यों  लगता है ये झुठी आवाज़ है, प्रश्न सर उठाते है, ' आज़ाद है ' कौन, किससे, कब, कहां  ? क्या नहीं दिखता ? दबा, झुका, सिमटा, रुका, अटका,भटका पस्त, लाचार, रेंगता, लड़खड़ाता आपको नज़र नहीं आता? जाहिर है, आप सावधान में खड़े हैं अपनी मान्यताओं में गड़े हैं  नज़र उपर है, क्योंकि झंड़े खड़े हैं, और पांव तले रेंगते हुए सच, नज़र नहीं आते    जाने दीजिये, आपकी मज़बुरी है, आप आज़ाद हैं ये जश्न आपको मुबारक हो!

अरमान, जज़्बात और सामान

कुछ लम्हे उम्मीद के, कुछ साथी नसीब के, जिंदगी अब भी गुज़र रही है करीब से अरमान सपनों मे आसान बनते हैं आँख उठती है तो आसमान बनते हैं इरादॊं के सामान बनते हैं, बेहतर है आप अपनी जान बनते हैं हर जज़्बात कहाँ शब्दॊं मै बयां होते हैं, कुछ अरमान रंगॊं मै जवां होते हैं, हर सच्चाई नज़रॊं से नज़र नहीं आती, वक्त के दीवारॊं पर निशाँ होते हैं नजर उठ कर कहाँ तक पहुंचेगी, उम्मीद अब कौन से अरमानो को सीचेंगी, अपने एहसासॊं से जुड़े रहिये, पुकार आपको कशिश बन कर खींचेगी.. क्यॊं इंतज़ार करते हैं आप ही जिन्दगी हैं इरादे आप के, आप की बंदगी हैं, कदम उठाइये और जमीं नज़र आएगी सपने हॊंगे और नींद नहीं आएगी अश्क बहते हैं ज़ज्बातॊं कि जमीं पर उम्मीद कायम रहे जरा यकीं कर मुस्करा और मौसम को हसीं कर हल्का लगेगा, चल मुश्किलॊं को यतीम कर कुछ नयी बात करें अपने होने में क्या मजा, जो है, उसे खोने में आज जी भर सो लो, रात होने में सपने, काम आयेंगे सुबह बोने में तुम, सफ़र हो अपना! तो रास्ता क्या हो ? मोड़ मिलेंगे सो वास्ता क्या हो सच को हमसफ़र रखना क्या सोचें अंजाम क्या हो