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चौबीस दूनी...?

चौबीस दूनी अड़तालीस, अब भी उतनी ही ख़ालिस, वही प्यास, वही आलस (सुबह 6 बजे) न गुस्सा कम, न प्यार, बातें चार, मर्ज़ी से मन और मर्ज़ी से लाचार, घर का अचार, सुविचार!! रंग बदले हैं (समझ जाइए) पर ढंग नहीं, साथ बदला है पर संग नहीं, ताकत बढ़ रही है, कमजोरी कम नहीं होती, कितनों का यकीन हैं, नज़र महीन है, कदम कदम चाल है, और उफ़क़ परे ख्याल है दर्द गहरे हैं, और क्या, वही ख़ास है अब वज़ह, सवाल मासूम हैं, "ऐसा क्यों नहीं? समझते क्यों नहीं?" रास्ते दिखते हैं पर कदमों से दूर हैं, सौ मजबूर हैं, पर हाथ खड़ें नहीं हैं, कंधे झुके नहीं हैं, उम्मीद ज़ारी है, जो बन पड़े , बुनते हैं बड़े गौर से सुनते हैं, साथ उनके, सब सपने बुनते हैं! रास्ते अभी भी वैसे ही,  तय नहीं हैं, कहीं पहुंचना है ये चलने की वज़ह नहीं है! रुकना वज़ह है केवल, कोई तय जगह नहीं है! अजनबी नहीं हम,  आप पहचानते नहीं हैं, आपके आइनों को हम मानते नहीं हैं!

स्वाति सवाल

बचपन से दुरी बड़ी है  जवानी से खिंचाव  आगे और पीछे कितने साल कतार लगाए खड़े हैं, किसकी सुने, कहाँ देखें? हड्डियों की आह सुनें, या क़दमों की चाह बालों का रंग देखें  या आईने की उमंग, पतंग की उड़ान देखें  या डोर की थकान, घर, दुनिया, दूकान देखें या रास्ते अनजान देखें  हूँ! मम्म उम्म्म अआः  जवाब नए पुराने ,  कुछ जल्दी में, कुछ थके हुए,  जोर मारते, लगे हैं, अपने को सही साबित करने में किसका भरोसा करें? सच और सही  हमेशा एक नहीं होते, और सवाल? रोज नए हैं! आजाद, उत्साहित,  हर दम, नए की खोज में, हमसफ़र, हर कदम, बदलते,अपने बचपन में इठलाते, चंचल, शोख, तो फिर? अरे रे रे रे रे ! माथे को शिकन न दें,  आँखों को विनम्र रहने दें,  में कोई जवाब नहीं,  में सवाल हूँ,  पूछ लीजिये! इस नए सफ़र में आपका खैर-मकदम है! (उम्र की एक और सीडी पर स्वाति के क़दमों को नज़र)