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झुर्रियां!

मुझे झुर्रियाँ चाहिए, अपने  चेहरे की महीन दरारों में, यादनामा लिखना है, ज़िंदगी  के गहरे ज़ख़्म  झुर्रियों की तमाम परतों में, ज़ाहिर उन नज़रों पर, जो मुझ पर टिकती हैं, और हर एक उगते सूरज से मिलता तोहफा, नई सांस भरने का, वो देखा!! एक दोपहर मैं इतना मुस्कराया मेरा पूरा चेहरा भर आया!! -विलो टैगान