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क्या गुनिए, क्या गुनगुनाइए!

गोली मारो कहबे, मूरख सोच के नेता चुनिए सहनशील संस्कृति बीरों की कथनी सुनिए! कथनी के सब बीर, कही अनसुनी करिए, बातों के तीर बचने, चलीं अब बहरा बनिए! बातों के सब तीर, मलहम का कर बनिए फिसली हुई जबान जालिम कहिये-सुनिए कहिये-सुनिए सबकी, पर यूँ ना गुनिये काँटों का, का दोस् ,जीवन आप जो बुनिए? बुनिए जीवन ऐसा जिसमें जगह हो सारी, मैं, मेरा, मुझसे की न लगने पाए बीमारी! लगे बीमारी ऐसी तो पूरी उमर सताए, अपनी ही तस्वीर सजाने तू वक्त गवाए! वक्त गवाएं सारा के बने गोरा-सुंदर क्रीम बेचते मदारी बने कौन है बंदर? बंदर बने बली के, हैं छुरी में धार लगाते, मुंह में इनके राम, पीठ पर छुरी चलाते! छुरी पीठ पर जैसे बनी सरकारी नीति, मिट्टी पैरों के नीचे के बनी है रेती! रेत बन गए सपने सब हाथों से छूटे? टूट गए हैं कितने, कितने खुद से झूठे! खुद से झूठ बोल रहे उनको क्या समझाएं, कहाँ आगयी दुनिया और कहाँ अब जाए?