साथ है बस यही बात है हां कई जज़्बात है, जज़्बात काफूर हैं साथ हालात है, साथ है बस यही बात है! साथ है, दिन है, रात है, काम की बात है, ज़ाहिर मुश्किलात है, मुश्किल कम’उम्र है, साथ सफ़र है, साथ है बस यही बात है! साथ है, मुलाक़ात है, तुमसे तो, खुद से भी, अजनबी फिर भी कई लम्हात हैं, बाक़ी कई बात हैं, सो साथ हैं बस यही बात है! साथ हैं, सवालात हैं, तमाम जवाबों के, जो अधूरे हैं, जो बदल गये, कुछ फिसल गए, छूटे नहीं हैं, साथ हैं, बस यही बात है!
जलते हैं अपनी आग में तुम क्या हमें जलाओगे, गले लगने तैयार हैं क्या तुम पास आओगे? जल रहे हैं वो भी जो हिम्मत कर के आ गए, राख बन कर कहते हैं, और कितना सताओगे? कुछ यूँ भी कद्रदान हैं जो पानी छिड़कने आ गए! बुझती हुई आग है, क्या अब भी यूँही चाहोगे? आग ख़त्म नहीं होती और राख भी नहीं होते! ज़ख्म पूरे हुए ही नहीं, मलहम जो तुम बनाओगे? हां जी!! राख हो भी गए तो हवा हो जायेंगे चीखती रहें सब ठोकरें के ख़ाक हो जाओगे! वो आग ही है जिसे तुम ज़ख्म कहते हो! जल जाओगे जो यूं रिश्ता निभाओगे!