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बुनना–बनना

  बिखरे हैं, टूटे नहीं है, अपने ही साथ से छूटे नहीं हैं, साहिल हैं अपने ही समंदर हैं, कितने भंवर हैं जो अंदर हैं, चले हैं सब समेट कर, भटके   नहीं हैं, सफर है रास्ते दिखते नहीं हैं, बनते हैं, हर कदम से, एक एक कदम पर बदल रहे हैं, जो बुन रहे हैं, वही बन रहे हैं! अज्ञातमित्र