चलते फिरते, भागते भागते घूमते रस्ते तेज धीमे बदलते वास्ते बनते बिगड़ते, आसान, मुश्किल रास्तों से वास्ते, जाना तय है, और पहुँचना? कहां हैं? वो कोई एहसास है, या कोई जगह है? और साथ किसका, कौन सी वजह है? तमाम रिश्तों की जुड़ती कड़ियां सफ़र हैं, रस्ते, मोड़, मकाम तमाम, घर- दुकान, वीरां मैदान पेड़ उगते उखड़ते, पानी पहाड़, पिघलती बर्फ, बहती धाराएं क्या इनका असर है? बिना उस असर के क्या सफ़र सफ़र है?
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।