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चलो खेलते हैं!



चलो खेलते हैं,
उन सब बातों से,
मुलाकातों से,
जज्बातों से,
हालातों से,
सौगातों से,
जो बोझ बनती हैं,



खेलते हैं,
मर्यादा से,
चरित्र से,
परंपरा,
मान्यता,
जो जंजीर बनती हैं,




चलो खेलते हैं,
जंजीरों से,
जो हमें कम करती हैं,
किसी के रंग से,
एक तय ढंग से,
किसी के कद से,
उम्र की हद से,
जात, धरम, पद से,
पैसे की मद से,



चलो खेलते हैं
उन बच्चों से,
सब बच्चों से,
जो सताए हुए हैं,
डराए हुए हैं,
भरमाए हुए हैं,
तालीम के मारे हैं,
पैसे बहुत सारे हैं,
प्यार के बेचारे हैं,
सदमे बहुत सारे हैं,

चलो खेलते हैं,
खुद से,
अपने आईनों से,
अपने मायनों से,
उछाल देते हैं सब
हवा में, देखें
क्या हाथ लगता है?
क्या वैसा का वैसा
ओ क्या बदलता है?
आपको चलता है?


(पूना में हाल में हुए अनुभव आधारित शिक्षा की सालाना कॉन्फ्रेंस में प्ले फॉर पीस यानी खेल से मेल संस्था और प्रक्रिया के अभ्यासकर्ता स्वाति भट्ट, सिंधुजा और आज्ञातमित्र के सत्र का विषय था "खेल - जरिया अविरोध का" । इस सत्र का मकसद ये समझना था की कैसे खेल (प्ले फॉर पीस) के जरिए हम शोषण, हिंसा और सदमे से मुकाबला करने का सामर्थ बना सकते हैं। )
www.playforpeace.org 

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