जलते हैं अपनी आग में तुम क्या हमें जलाओगे, गले लगने तैयार हैं क्या तुम पास आओगे? जल रहे हैं वो भी जो हिम्मत कर के आ गए, राख बन कर कहते हैं, और कितना सताओगे? कुछ यूँ भी कद्रदान हैं जो पानी छिड़कने आ गए! बुझती हुई आग है, क्या अब भी यूँही चाहोगे? आग ख़त्म नहीं होती और राख भी नहीं होते! ज़ख्म पूरे हुए ही नहीं, मलहम जो तुम बनाओगे? हां जी!! राख हो भी गए तो हवा हो जायेंगे चीखती रहें सब ठोकरें के ख़ाक हो जाओगे! वो आग ही है जिसे तुम ज़ख्म कहते हो! जल जाओगे जो यूं रिश्ता निभाओगे!
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।