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ज़िन्दगी ख़ाक की!!



ज़िन्दगी दावत है,
किसी को...
बग़ावत है
किसी की ?
आदत है, किसी की
मुश्किल,
और कोई

आसान, काम
किसी का, नाम
कोई बदनाम,
मुफ़्त पहचान
सरेआम, अकेले,
भीड़ में,
दौड़ रोज़ की,
होड़, काहे?
बेपरवाह, आगाह?
अपने सफ़र से,

दोस्ती, अजनबी
मुसाफ़िर से,
चलते रास्ते
आपके,
भांप के, नाप के
किसी और के?
किस छोर के?
सहारे,

या यकीन मंझदारे?
सह रहे हैं या
बह रहे हैं, ख़ामोश
या कह रहे हैं?
अपनी बात, 


ज़िंदगी ज़ज़्बात,
क्या परवा साख की?
आखिर
ज़िन्दगी ख़ाक की!!




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