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छियानवे बाईसी

बात तारीख की नहीं तारीख़ी की है,
गौर कीजिए ज़रा बारीख़ी की है।


साल छियानवे, महीना जून, मुकाम अहमदाबाद,
अकेले थे 'हम' चन्द मुसाफिरों के साथ,
थी पहली मुलाकात,
हम तब भी रिश्तों के ज़ाहिल थे,
और वो तब भी रिश्तों के क़ाबिल!


फिर भी कुछ सुर मिल गए,
कुछ ताल जम गई,
और कुछ बाल रंग गए!


वो दुनिया के अकेले थे,
हम दुनिया के अजूबे,
अलग रास्तों पर चलने के शौकीन,

मुसाफिरी तो उसी वक्त शरू हुई,
फिर धीरे धीरे रास्ते एक हुए,
और हमसफ़र नेक हुए!

बाइसों बाते हैं,
चौबीस घँटे का साथ है
घर की बात नहीं,
काम की बात है,
काम भी साथ है,
अब हम ही मुश्किल हैं,
एक दूजे को, ओ
हम ही आसान भी,
उलझन भी हम ही हैं,
सुकूँ भी!


सफ़र ज़ारी है,
मंज़िलों के हम दोनों ही गुनहगार हैं,
रास्तों के तलबगार!

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