ज़िंदगी नाम है,
या काम?
संज्ञा, सर्वनाम?
क्रिया, विशेषण?
या ये सब तमाम?
क्रिया बिन क्या नाम?
नाम बिन कोई काम?
काम कोई विशेष हो
जो बन जाए सर्वनाम?
या सर्वनाम काम है?
जैसे उपनाम है,
जन्म दर जन्म,
आपको जकड़े हुए,
जात, धर्म विशेषण,
क्रिया एक शोषण?
कुरीति, कुपोषण?
और उन सबका क्या,
जो बेनाम हैं,
उनके लाखों काम हैं,
न उनकी कोई संज्ञा,
न कोई सर्वनाम है!
भाषा से ही,
भाषा में भी
उनका काम तमाम है!
हिम्मत के हथियार चाहिए नफरत नहीं प्यार चाहिए अपने हाथों में हो अपनी कश्ती की पतवार , हिम्मत के हथिया र, हिम्मत के हथियार.... कौन कहे किस को बेगाना , मजहब किसने समझा जाना मंदिर मस्जिद की बातों में, नफरत से इंकार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... कब तक हम बर्दाश्त करेंगे, मासूमों पर वार सहेंगे दिल में अपने प्यार जगा दे, अब ऐसी ललकार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... अपने सबको ही प्यारे हैं , बीच में कौन से दीवारें हैं गुलशन हरसू फूल खिला दें, ऐसे कारोबार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... हमको सबका साथ चाहिए, हर झगडे की मात चाहिए नेक इरादों के मौसम से, ये दुनिया आबाद हिम्मत के हथियार , हिम्मत के हथियार.... सबके दिल में आस चाहिए , उमींदों की प्यास चाहिये मौसम बदलेंगे जब बदलें, मौसम के आसार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... हक की सारी बात चाहिए नहीं कोई खैरात चाहिए, चलिए बनें संविधान के ऐसे पहरेदार, हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... हमको खबर ए यार चाहिए दोस्ती भाईचार चाहिए रि...


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