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चौबीस दूनी...?


चौबीस दूनी अड़तालीस,
अब भी उतनी ही ख़ालिस,
वही प्यास, वही आलस (सुबह 6 बजे)
न गुस्सा कम, न प्यार,
बातें चार,
मर्ज़ी से मन और
मर्ज़ी से लाचार,
घर का अचार, सुविचार!!



रंग बदले हैं (समझ जाइए)

पर ढंग नहीं,
साथ बदला है पर संग नहीं,
ताकत बढ़ रही है,
कमजोरी कम नहीं होती,
कितनों का यकीन हैं,
नज़र महीन है,
कदम कदम चाल है,
और उफ़क़ परे ख्याल है



दर्द गहरे हैं, और क्या,
वही ख़ास है अब वज़ह,
सवाल मासूम हैं,
"ऐसा क्यों नहीं?
समझते क्यों नहीं?"
रास्ते दिखते हैं
पर कदमों से दूर हैं,
सौ मजबूर हैं,
पर हाथ खड़ें नहीं हैं,
कंधे झुके नहीं हैं,
उम्मीद ज़ारी है,
जो बन पड़े, बुनते हैं
बड़े गौर से सुनते हैं,
साथ उनके,
सब सपने बुनते हैं!



रास्ते अभी भी वैसे ही, 
तय नहीं हैं,
कहीं पहुंचना है ये चलने की
वज़ह नहीं है!
रुकना वज़ह है केवल,
कोई तय जगह नहीं है!
अजनबी नहीं हम, 
आप पहचानते नहीं हैं,
आपके आइनों को
हम मानते नहीं हैं!


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