सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

शून्य एहसास!

हर सफ़र को हमसफ़र लाज़िम है
बेचारगी कैसी कि कोई काश मिले



यूँ सफ़र करते हैं इस दौर के इंसान
मुड़ के देखें तो रस्तों की लाश मिले



हमसफ़र साथ चलने को और क्या
मत सोचो कि मंज़िल कोई पास मिले




उम्मीद बेमानी कि कोई खास मिले
तस्सली जो साथी कोई रास मिले,



पास आने से दुरियाँ नहीं मिटतीं,
गनीमत हो जो ये एहसास मिले







नज़दीक आईये खत्म नहीं हुए,
लम्हों में शायद कोई साँस मिले,

कब कोई लम्हा कहीं उदास मिले,
यूँ देखिये शून्य में कोई आस मिले!



टिप्पणियाँ