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दिन रात

रात बैठी हे सिऱहाने पर, तुली है आखॊं में आने पर
पर जहन मश्कुर है, कैसे बैठे जमाने के पैमाने में

सुबह पैरॊं तले सिकुडी पड़ी है, ये घडियों की गुलामी बड़ी है
अपनी कौन सी अड़ी है, गुजर जाये जो जल्दी पड़ी है!

शाम ऐसे इतरा रही है, जैसे गुजरना ही नहीं है,
दिन गया तो रात सही, कुछ करना ही नहीं है.

धुंध छाई है, आज रौशनी ही परछाई है,
ये कैसी सुबह है, सूरज ने ली अंगडाई है

सुबह कि ठंड से जल गया सूरज,
मन ठान के फिर चल गया सूरज,

ओड़ती चादरॊं ने अहं को आवाज़ दी,
चल गयी दुनिया, जल गया सूरज


रात के पहलु में बैठे दिन कि बात करते हैं,
ठिठुरती दीवारों में ख्यालॊं कि राख करते हैं,

ठहरी अंगडाईयॊं को कहाँ कुछ खबर है,
यूँ ही हम अक्सर बात करते हैं !

एक दिन की तीन करवट, हर मुश्किल नहीं पर्वत
कुछ हलचल है दिल की, कुछ जहन ने की हरकत

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