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बेकल मन!


मैं उदास हूँ,
कल था, आज हूँ,
आस हूँ, प्यास हूँ,
उम्मीद से हताश हूँ,
मैं ख़ास हूँ,
फिर भी,
अपने ही सवालों से
बदहवास हूँ,

अकेला,
अपने साथ हूँ,
और भी हैं,
बात करने को,
पर आखिरकार
दिन लंबे हैं
और रात,
बोलती है,
और न जाने कैसे,
दिलोदिमाग के
सारे अंधेरे कोनों में
गूंज उठती है,
उनका सामना करती
अपनी ही मुस्कराहटों
से थक चुका हूँ!
सच चुका हूं!

अपनी कामयाबी से, 
जो मेरे चारों तरफ है,
सामान बनकर,
जेब में पड़ीं
दीवारों पर जड़ी,
लाइफ़ साइज़ तस्वीरें, 
मुझे ही क्यों छोटा करती हैं?
कितनी चमक है
मेरी,
मन बहलाती कभी
मुझे ही झुठलाती,
आगे क्या है?

मेरी क्या वज़ह है?
मेरी क्या जगह है?
सपने,
जो मैंने पाले हैं,
दिल पर
उसी के छाले हैं!
अपनी ही मुस्कराहट से
उदास हूँ,
लगता है अपने पास हूँ,
और दूर तक
रास्ता नहीं कोई,
इसलिए चलता हूँ!


बहुत उलझाते हैं
ख़याल, सवाल,
इसलिए निकलता हूँ!
यही एक रास्ता
दिखता है,
जो मुक़म्मल है!
इसमें कहाँ कोई कल है,
आज मन बड़ा बेकल है!
चल!

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