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पारस्परिकता!

ये भी एक सफ़र है,
ज़िंदगी असर है,
आपकी नज़र में नहीं,
इन रास्तों की,
कहाँ आपको ख़बर है?

आप समय से चलते हैं,
लम्हे, पल, 
दिन महीने साल,
कामयाबी मलाल!



हम चलते हैं,
वक़्त बदलने को,
हम नापते नहीं,
भांपते हैं!

गलतफहमी है,
मौसम हमें नहीं बदलते,
हम साथ चलते हैं,
एक - दूजे से ढलते हैं,
मिट्टी भी हम, बादल भी,
हम ही पहाड़ भी,
नदी, नाला, तालाब भी,
कोई छोटा-बड़ा नहीं!
ये आपका नज़रिया है,
नज़र नहीं,
सच आपको!

आप दौर में अटके हैं,
नई चीजों से भटके हैं,
कपड़े भी बदल लिए तो सोचें
आप हटके हैं!



निरी मूरखता,
कोई भी हट के नहीं, 
आप भी जानते हैं,
सच में आप गोबर हैं!

बुरा लग गया?

यही आपकी समस्या है,
दिखे सुने में फंसे हैं,
एक दूजे पे हंसे हैं,
नफ़रत, मोहब्बत, अच्छे-बुरे,
ज्यादा-कम, सही-गलत?



तराजू के बंदर हैं आप!
एक पल स्थिर नहीं!

ऊंच-नीच के खेल खेलिए!



हम देख रहे हैं, 
अपनी जगह,
काट दीजिए,
छाँट दीजिए,
हम फिर भी वही हैं,
न गलत हैं न सही,
आपसी,
एक और अनेक,
एक साथ,
पारस्परिक,
और आत्मनिर्भर भी?



समझ जाएंगे जिस दिन,
उस दिन आप 
हम होंगे!

पेड़, पत्ते, पहाड़, पत्थर,
मिट्टी, ओस, पानी,
कभी हरित, कभी आसमानी!

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