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संदेश

राम, शमशान और बदलते रस्ते !!

खुद को आज कुछ रुका हुआ पाते हैं, कौन जाने यहां से रास्ते कहां जाते हैं!  मुश्किलों को कंधे पे ले कर रामनाम करते हैं, क्यों आप अपनी दुआओं को शमशान करते हैं! ये अभी अभी की बात है, या पहले कि कोई रात है, अब अजनबी से क्या कहें, ये अजनबी से बात है! उस दौर से गुजरते हैं, कि उसुलों को फ़िज़ूल करते हैं, जिस जमीं पर खड़े हैं कीमत उसीसे वसुल करते हैं! बात पुरानी ही सही, तारीख बदल चुकी है, समझ बारिख है, गुमां है, रस्ते बदल चुकी है ये भी एक पहचान है, खुद से ही अंजान है लिये बोझ कुछ होने का, खालीपन सामान है! उड़ने का जिगर है, क्या पुछें उड़ना किधर है, हवा का रुख एक जाल है, या कोई सवाल हैं? क्यों रस्ते भटकना, सफ़र को हमसफ़र कीजे, जो अक्स यकीं में उस को ही असर कीजे! सच सब तरफ़ मौज़ुद है उसकी क्या तलाश, नज़र होगी आपकी जो दिख रही है लाश!

जो है सो है! हाँ नहीं तो!!!!

क्योँ आसमानी बुलंदी पर नज़र है, गर आपके इरादॊं में जिगर है? क्या इरादे आसमान चाहिये, या बस इसाँ आसान चाहिये? एक काबिल अंदाज़ चाहिये या सर कोई ताज़ चाहिये?  सामने सफ़र है पीछे घर है, काहे को पुकार चाहिये?  तमाम सलाहियतें और खुब कमियां नज़र जरा नज़रअंदाज़ चाहिये युँ ही दुरियाँ कम नहीं‌ होतीं (जमीं आसमान की)‌ पलकें थोड़ी सी नम चाहिये! झोली भरने को नहीं, संभलने को है फ़कीरी में क्यॊं गोदाम चाहिये? जो मिला है वो काफ़ी हो, काहे किसी को राम चाहिये?

बातचीत की धुरी, फ़िरकी, चक्कर!

कितनी बातें की हैं  , कुछ दिल ने कुछ दिमाग ने तय की हैं  ,  कितनों तक पहुंची है कोइ बात सोचते सोचते हो गयी रात हो गयी फ़िर वही बात न रास्ते अलग हैं , न संघर्ष मैं जिस जगह पर हुँ , उसका क्या हर्ष पीछे मुड़ कर देखो  ; तो पीछे वाले लोग ही नज़र आयेंगे  ! निरीक्षण में अक्सर निष्कर्ष नज़र आयेंगे  ! निष्कर्ष है भुत का नांच निरीक्षण है सांच को आंच चेहरे के सामने कांच निष्कर्ष है दो और दो पांच तलवे में चुभी फ़ांस हलक में फ़ंसी हड्डी न खत्म होती कबड्डी  , चलो भावनाओं से जुड़ें सुनें , दिल बोलता है , हमेशा इशारा करता है , पर उस से कहां किसी का मन भरता है , हम अपनी सोच में अटके , लगते हैं हर अनुभव को , काटने - बांटने - छांटने उंच - नीच , अच्छा - बुरा , सही - गलत वो सब कुछ जो करे खुद से दुर  , क्या खबर , खुद को है क्या जरुर ? जरूर . . . क्या ?  हवा पानी और ज़रा सी नादानी  , थोड़ी अपनी और थोड़ी उनकी  , फ़िर क्यॊं किसी को इतना पुरा करते हो  , और ज़रा कदम चूका तो ...

हिसाब चालीसी!

चलो जिन्दगी कि गणित बदल दें, उम्र प्यार कि हो, (जितनी बढे उतना अच्छा), दिन कि जगह दूरियॊं का सोचें, (जल्दी गुजर गया तो अच्छा) महीने मुलाकातॊं से बदलें, और साल लोगॊं से जुड़ने पर, जब दिल आये तो वक्त थम जाये और टूटे तो काफ़ुर हो जाये वार मिज़ाज़ से बदलें, प्यार सोमवार, इकरार मंगलवार, यार बुधवार रुठ गुरुवार, मन्नतें शुक्रवार, सुलह शनिवार, रंगीला रविवार, वैसे दिन तो लंबा होता है, क्या हिसाब हो, प्यार में हर दिन एक साल है, महीने लम्हॊं से बने, और हफ़्ते पल पल के हॊं आप इश्क़ में हैं तो समझेंगे, मौसम बदलते देर नहीं लगती, दिल की धड़कनें, घड़ियॊं से नहीं चलती हालात महीनॊं नहीं संभलते, हाथ में हाथ हो, तो युग बदल जायें  मौसम नहीं बदलते, दिल के केलेंडर, किसी फ़ोर्मुले पर नहीं चलते इश्क़ के खेल में गणित फ़ेल है,  और ये मत समझना कि हिसाब में कमज़ोर हैं, दिल में चोर है, या दाढी में तिनका, घड़ियाँ गिनी हैं, पल पल सहेज़ के रखा है, हर लम्हे का हिसाब है, पहली नज़र, खामोश असर, वर्षों सबर, वो हसीन सहर, नज़रॊं से कहर, चार घंटे, चालीस पहर, मुस्कराहटें, घबराहटें, दो पल की खामोशी, एक युग क...

बहना-ठहरना

नदियां अगर साहिल को तलाशें तो क्या कभी बह पायेंगी और समंदर बन पायेंगी? स्थिरता, ठहराव ये सब बस मरुस्थल की परिभाषा है जो प्यासा रहना भूल गया पृथ्वी के एक टुकड़े का अर्थहीन सन्यास सब से अलग रहना यानि खुद को भ्रम में रखना सब में रहकर जो अलग हो तो कुछ बात बने  लालसाओं से दूर जाना अलग लालसाओं को ठुकराना अलग नदी से सीखो, उसे अगर  किनारे पर पहुँचने का लालच आ जाये तो तालाब बन जाये, संमदर कभी नहीं रुको नहीं, नदी की चाल पहचानो बहो नहीं_ _ _ बहना सीखो  स्थिरता!  रुकने में नहीं, ठहरने में नहीं बहाव के रुख को पहचानने में है स्वयं एक धारा बनने में है इस विचार को उस विचार से मिलने दो धाराओं के मेल को नदी बनने दो रुको नहीं बहो आज बनती है नदी, तो कल संमदर बनने दो !

रिश्ते, कड़वाहट और दो घूँट ज़हर!

तमाशा सारी बातॊं का, मेला रिश्ते नातॊं का बड़े काम का है समझो अब महकमा लातॊं का वो अपने, काम के हैं क्या, वो अपने काम के है क्या? सब अपने, नाम के हैं क्यॊं, सब अपने नाम के हैं क्या? पैदा किया तो बाप होते हैं, जबरन 'आप' होते है रिश्तॊं के नाम से न जाने कितने पाप होते हैं कभी पुरे नहीं पड़ते, अजीब उनके माप होते हैं वो "बड़े" बनते हैं उम्र के और हम खाक होते हैं  नौ महीने का अचार, कह दिया इस को मां का प्यार अपनी बात को आँसू चार, लाचार ममता या व्यापार? ममता है तो क्यॊं सिर्फ़ 'अपने' नज़र आते हैं? क्यॊं कर रिश्ते सारे खून से लकीरें बनाते हैं?  त्याग भी है और आँसू भी, और बेबसी आदत है, दुनिया ज़ुल्मी है, और हरदम इसकॊ दावत है! मर्द को जात कैसी, भुत को बात कैसी, बिन अंधेरॊं के रोशन कायनात कैसी?  आप तो मर्द है, ये मसला बड़ा सर्द है, ये कैदे उम्र है और लावारिस सब दर्द हैं! रिश्तॊं के आचार को मसाला नहीं लगता, ऎसे भी भुखे हैं कोई निवाला नहीं लगता! सारे रिश्ते खुन के, रिसते हैं तमाम उम्र, बेखबरी जख्मॊं से कैसे हो वहशियत कम! अपनी मुस्कराहट से ...

तलाश, तलाश की!

वो रोशन रात थी या उज़ालॊं की लाश थी बुलंद इमारत, कामयाब इबारत, अंदाज़ जश्न के, और इतनी रोशनी कि सच्चाई जल गयी, ठिठुरती बेबसी अधनंगी सी, कैसे पल गयी, "काश” होती एक जिंदगी, जैसे गड़्ड़ी से फ़िसल गया ताश कोई, बेसब्र नज़र इस आस में‌, कि मिलेगी तलाश कोई, और हम बस चल रहे हैं, एक और शाम, और हम निगल रहे हैं, अंदाज़ भी है, एहसास भी, इरादे भी, फ़िर भी सहारा दे नहीं पाती, तिनका हुँ? पर खुद भी बह रही हुँ, किनारा होने को . . . . क्या नहीं दे दुं! नज़रें बेबस से नहीं मिलीं, पर खुद की बेबसी संभल गयी, एक रास्ता नहीं मिला, पर अपनी सुबह को रोशनी दिखा दी, कैसे कहुँ मज़बुरी थी, मेरी नज़रॊं ने आज़ मेरी उम्मीदें जगा  दीं ! आमीन ! (किसी की एक शाम की चहलकदमी से चुराये हुए ज़ज्बात)