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संदेश

क्या देखा!

सपनों के हक़ीकत बनने कि बात करते हो, हमने अकीदत को यहां खुदा बनते देखा है! खुद में मसरूफ़ होकर महफ़ूज़ नहीं होते, हमने खुदा को भी तो यहां लुटते देखा है! कल जमाना खुशियों पर मगरूर था, आज उसको लकीर पीटते देखा है! वक्त का घोड़ा हम सब पर सवार है, हमने कब वक्त के उस ओर देखा है? देखी तो हमने भी बहुत सारी दुनिया खुली  आंख  सुबह तो कुछ और देखा है! वही मातम अपनों को, परायों की नुमाईश है, अपनों से आगे हमने, कहां कुछ और देखा है? माना ये दुनिया हर तरफ़ लक्ष्मण रेखा है, हमने भी पलट कर कहां‌ खुद को देखा है! नफ़रत की क़ैद में अब सारी आशनाई है, पहले कहाँ इतना कुछ नागवार देखा है? डर ने घर बना लिए हैं कितने ज़हन में, बड़े फ़ायदे का किसीने कारोबार देखा है! शक ही काफ़ी है गुनहगार बनाने को, जहां देखा भीड़ का इंसाफ़ देखा है! इंसाफ़ की कब्र पर मंदिर बनते हैं, इस सदी भी ऐसा रामराज देखा है!

#SunwayiChahiye

अररिया में कुछ साथी हैं, काम की उनकी बातें हैं, ज़मीन से जुड़े नाते हैं, एक हैं उसमें जो तन्मय कहलाते हैं, आवाज़ उठाते हैं, सामने आते हैं, सामना करने, अन्याय का, अनुचित का, जिसको मुश्किल में पाते हैं जा, अपना कंधा मिलाते हैं, साथ संग पाँव उठाते हैं! और एक कल्याणी हैं, दिल की उनकी वाणी है, दिल से सारे नाते हैं उनकी भी यही बातें हैं, दोनों बड़ें विश्वासी हैं, संविधान के वासी हैं, न्याय के पिपासी हैं उनका क्या दोष हुआ, गलत को गलत कहना ये गुनाही उदघोष हुआ? और इंसाफ़ छुट्टी पर है, कुछ की मुट्ठी में है? इसलिए आपका साथ चाहिए, एक साथ आवाज़ चाहिए, दूर दूर तक बात चाहिए, जोड़िए अपना नाम, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम चार से छह बजे आज शाम  आ सकते हैं आप बड़े काम धन्यवाद शुक्रिया प्रणाम!

किसके आसमाँ?

एक एक कदम!

हर कदम  पूरा सफर है, उसके बिना  अधूरा सफर है, पहला कदम  शरुवात है, पूरी, दू सरा,  इरादों की मंजूरी, तीसरा, नीयत जरूरी, और एक कदम, काबिलियत और एक कदम तैयारी, जज़्बा, हिम्मत, कुव्वत, शौक, पूरा होश, और जोश, एक और, और एक, साबित कदमी कुछ और यकीन, और, कुछ मोड़ आख़िरकार  सामने नज़र, चंद और कदम और चार कदम जरूरी, तीन कोस दूरी, दो बातें अधूरी, एक होती जिस्म और रूह , अंत है या शुरुवात, फिर किसने रोक रखा है? बस एक कदम  पूरा करिए, सामने है, दूरी पूरी करिए, बस एक कदम, वो ही सफर है, वो ही दूरी, वो ही जरूरी, बात उसी से पूरी, बाकी सब बातें हैं अधूरी!

पहचान - एक गुलामी

बचपन से सिखाते हैं, मुझे "मैं" बनाते हैं, अलग करके सब से रिश्ते दिखाते हैं, जज़्बात जगाते हैं, प्यार, देखभाल, मदद हरहाल, इज़्ज़त, और फिर इन सब को सही-गलत, अपने-पराये छोटे-बड़े के दायरे में बंद कर नैतिकता बनाते हैं, चेतना बना कर सरहदों के कैदी बनाते हैं, इस तरह आज़ाद हो हम दुनिया में आते हैं!

पहचान - एक ज़ुबान

ज़िंदगी नाम है, या काम? संज्ञा, सर्वनाम? क्रिया, विशेषण? या ये सब तमाम? क्रिया बिन क्या नाम? नाम बिन कोई काम? काम कोई विशेष हो जो बन जाए सर्वनाम? या सर्वनाम काम है? जैसे उपनाम है, जन्म दर जन्म, आपको जकड़े हुए, जात, धर्म विशेषण, क्रिया एक शोषण? कुरीति, कुपोषण? और उन सबका क्या, जो बेनाम हैं, उनके लाखों काम हैं, न उनकी कोई संज्ञा, न कोई सर्वनाम है! भाषा से ही, भाषा में भी उनका काम तमाम है!

पहचान से - अधूरे

कोई भी एक पहचान, हमें अधूरा करती है, हवा, पानी, राख, मिट्टी, लाखों ख़्वाब, रंग जाने पहचाने, रिश्ते, माने न माने वो सब जो कभी हाथ थामे, कभी एहसास बन, कभी प्यास बन, हमारे रास्तों के हमसफ़र हैं, बिन उनके, हम कम हैं, हम एक हैं नहीं, पूरे अधूरे हैं, अधूरे पूरे हैं!