ताकत बैसाखी है, हमको लगता है ताकत की ही झांकी है, बचपन से ही, हमारे बड़े, घर के बड़े, स्कूल के बड़े, इधर उधर पड़े, सारे ही बड़े, जाने-अनजाने, अनभिज्ञ – अज्ञान में या झूठी शान में, अहम में, खोखले मान में, छोटों को कम करते हैं, सच कहूं तो, हमारे पर कतरते हैं, और थमा देते हैं बैसाखी, ताकत की, जब भी हमको बड़ा होना होता है, हम उसी बैसाखी का सहारा लेते हैं, रौब जमाते हैं छोटों पर, छेड़ते हैं लड़कियों को, मजाक उड़ा देते है, किसी का किसी को, नीचा दिखा देते हैं, कभी शरीर की ताकत, कभी तहरीर की, लड़कियों को शर्म, दलित को कर्म, दो जेंडर में फिट नहीं तो शर्म, ये ताकत हमारे मर्म को मारती है, मर्द हो तो रोना नहीं, औरत - शर्म खोना नहीं! चलिए इन बैसाखियों को तोड़ दें, ताकत के खेल छोड़ दें, अगर हम कम नहीं, तो कोई ज्यादा नहीं, बस इतनी ही बात है! तराजूओं से उतर जाएं, कम ज्यादा, सही गलत, बड़े छोटे, काले गोरे, ये सब बैसाखियों के प्रकार हैं, ताकत के हथियार हैं! ये करना आसान नहीं होगा, ये भी मंजूर करिए ये चश्मे दिमाग में चढ़े हैं, नज़र नहीं आते, पर बहुत बड़े हैं! किस...
Wah Wah sir aapne bahot accha likha hai
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