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जो हम नहीं होते!



चलते हैं उस रस्ते जो खत्म नहीं होते
चोट लगती है हमें पर जख्म नहीं होते

मरे महबूब की तमाम मुश्किलें हम से हैं
हम से ही कहते हैं काश हम नहीं होते



अपनी आदतों से मज़बूर वो अब नहीं होते
रात-दिन, शाम--सहर अब हम नहीं होते

नींद में तड़पकर हाथ थाम लेते हैं,
ख्वाबों में उनके, क्या हम नहीं होते?

हम में बदलने को रोज़ाना नयी चीज़ें हैं तमाम
जरुरत पड़ती है जब उनको हम कम नहीं होते




कितनी गर्दिशें‌ झेली हैं तो खुद को समझा है

और कोई होता तो बेशक हम नहीं‌ होते?

मतलब निकलता है तब तक साथ सबका है
मुश्किलों‌ में‌ तो गोया, हम हम नहीं होते!

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