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आंनद क्या और कब?

               
 
मैं जो जानता हूँ,
मैं कर सकता हूँ,
खूबसूरती से
उसे दरकिनार करूं


मैं जो सोचता हूँ
मेरा होगा
वो उम्मीद
कभी पूरी न हो


मैं जो आस लगाये बैठा हूँ
दूसरे सराहेगें,
स्वीकारेंगे
काश वो नौबत न आये


मैं जो लड़ता हूँ
पूरे गूरूर और
मुंहबाँइं आशंकाओं के रहते
वो मुझे हारना ही चाहिये


जो भी पकाउँ
“मैं"
और ‘तुम’ चखो
‘मैं’ बिगाड़ ही दूंगा


कोई आकर्षण
खूबसूरती कोई
देने में है
जहाँ जरुरत है


सहज जो भी
सामने. है
कोशिश जो
बस मौज़ूद


जो भी समझा
है बाहर दूर
बारीख नज़र में
है वही जो है


जो बनाता है
तुम्हें, कोई और
दिल की गर्मी के
आगोश में पिघल जाये


आमीन!
(करीबी आनंद चाबुकस्वर की कविता का इंग्लिश से अनुवाद)


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