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हाथ पर हाथ!!


मर्द बने बैठे हैं
हमदर्द बने बैठे हैं,
सब्र बने बैठे हैं,
बस बैठे हैं!


अल्फाज़ बने बैठे हैं
आवाज बने बैठे हैं,
अंदाज बने बैठे हैं,
बस बैठे हैं!


शिकन बने बैठे हैं,
सुखन बने बैठे हैं,
बेचैन बने बैठे हैं,
बस बैठे हैं!



अंगार बने बैठे हैं
तूफान बने बैठे हैं,
जिंदा हैं
शमशान बने बैठे हैं!

शोर बिना बैठे हैं,
चीख बचा बैठे हैं,
सोच बना बैठे हैं
बस बैठे हैं!


कल दफना बैठे हैं,
आज गंवा बैठे हैं,
कल मालूम है हमें,
फिर भी बस बैठे हैं!







मस्जिद ढहा बैठे हैं,
मंदिर चढ़ा बैठे हैं,
इंसानियत को अहंकार का
कफ़न उड़ा बैठे हैं!

तोड़ कानून बैठे हैं,
जनमत के नाम बैठे हैं,
मेरा मुल्क है ये गर, गद्दी पर
मेरे शैतान बैठे हैं!






चहचहाए बैठे हैं, 
लहलहाए बैठे हैं,
मूंह में खून लग गया जिसके,
बड़े मुस्कराए बैठे हैं!

कल गुनाह था उनका
आज इनाम बन गया है,
हत्या श्री, बलात्कार श्री,
तमगा लगाए बैठे हैं!!


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हुजूर भी हैं हम जीहुजूर भी हैं, पास हैं चाहे कितने दूर भी हैं! मंजूर भी हैं, नामंजूर भी हैं, अपनी खुशी से मजबूर भी हैं! कमजोर भी हैं और शूर भी हैं, बदलते लम्हों के मशकूर भी हैं! काबिल हैं दोनों अपने आप के, जरूरत नहीं फिर जरूर भी हैं! बेअदबी के कायल हैं दोनों, अपनी गुस्ताख़ी के शु'ऊर भी हैं! मलहम हैं तो नासूर भी हैं, इंसाँ हैं मखमली काफ़ूर नहीं हैं! शराफ़त नहीं है इस रिश्ते में, आम हैं हम खजूर नहीं हैं! मंज़िल नहीं रास्ते हैं रिश्ते, हमसफर हैं जन्नत जरूर नहीं हैं! साथ है यही मुकम्मल बात है, करवा की मंगल सूत्र नहीं है! बनी है वही बात जो बिगड़ी है, जेहन का क्या जज़्बात नहीं हैं?