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कुछ खोया . . . नहीं !


रुकी-रुकी सी सुबह ये रात कैसे गुजर गयी
ये हवा का रुख है बदला या खुशबू तेरी ठहर गयी

जो अभी-अभी थी जली हुई वो आग कैसे बुझ गयी
तूने पलकों का परदा गिरा दिया या आँख मेरी खुल गयी

वक्त-वक्त की बात है, तू हमेशा मेरे साथ है
तु ख्वाब मेरे तोड़ दे तेरी याद मेरे पास है

लम्हे-लम्हे का हिसाब क्या, एक उम्र पूरी गुजर गयी
अकेली ही थी तू, जो तस्वीर पर नज़र गयी

कभी-कभी ये ख्याल भी, रगें दिल की सिहर गयीं,
बस जिक्र तेरे नाम का, कुछ बात ऐसे असर गयी

जगी-जगी ये रात और सब करवटें ठहर गयीं
खामोश मेरे हालात थे और बात सारे शहर गयी,  

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