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शिकवा ए सुबह!

पूना शहर,
जैसे इमारतों का कहर,
फर्क पड़ता है?
क्या शाम, क्या सहर?
फर्क पड़ता है!

आपकी नज़र का,
उसके असर का,
आप पर?
पर आप को फुर्सत कहाँ?
यूँही गुम होती...
एक और सुबह!

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