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सबका विकास, अकल का अवकाश!


सब बडा है, 
सभ्यता, तरक्की, घमंड 
और बड़बोलापन, 
इंसान आज 
घुट्ने टेके खडा है!



चाँद तक पहुँच है, 
दिमाग की समझ है, 
सूरज की बिजली, 
जमीन से तेल, 
तेज़ रफ़्तार सब, 
और अब?


हर तरफ़ जंग है, 
सोच इतनी तंग है, 
किसी को पीछे छोड देना, 
कामयाबी है! 
नज़र नहीं आती, 
चारों तरफ़ बरबादी है!



आईने 
दिखा देंगे सच, 
आप नकाब तो हटाईए, 
आप पूरे हैं, 
और क्या चाहिए?


सुनिए,
खुद को, गौर से, 
दूर हो, 
दुनिया के शोर से, 
आप किसी की राय नहीं हैं, 
उदासी को निराश न करो, 
अकेलापन, अधूरा मन, 
सुन, 
आपको दोषी नहीं ठहराता!

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