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2016

सच्चाई नहीं बदली और साल बदल गया,
चन्द लम्हों को रात का माहौल बदल गया,
बदला ऐसा के शोर बड़ गया,
शायद दाढियों में तिनके का जोर है,
और हम से ये उम्मीद कि ज़रा जोर मुस्करायें,
तहज़ीबें कवायत है कदम मिलायें,
अच्छे दिन आयेंगे, एइसे गाने गायें,
चौंड़ा सीना बन जायें,
बकरी को गाय बनायें,
मज़हब के नाम सब गुड़-गोबर बन जायें,
सारी बहस ख़त्म हो जाएँ,
लाजमी है सब एक राय हो जाएँ,
मंदिर वहीँ बनाएं
अलग राय रखने वालों को
बजरंगी बन जाएँ
या तो चुप रहें या
मुँह काला करवाएं,
ज़रा भी शराफ़त बची है,
तो घर वापस आयें,


छोड़िये ये बातें पुरानी हैं,
तारीख बदल रही है
कई तरीकों से,
दीवारों पर, किताबों में,
शायद सब बदल जाए,
भेड़ों की संपन्नता देख,
आप भी भेड़ बन जायें


कल सुबह आप उठें,
तो खबर बतायें,
सब सकुशल,
सब बराबर,
न किसी की जात,
न ऊंच-नीच,
न गरीब-अमीर
न मजदुर न मालिक
मुबारक हो,
हमें भी जरूर बताएं,
जब आपका साल मुबारक हो जाये!

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