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सुनने की सर्दियाँ!



हमारे अंदर जो बेशकीमती है,
उसे अछूता रहना है
हमारी सोच से
जो हमारे होने को कम करती है|
उम्दा होने की
जो हमारी लड़ाई है,
उससे नहीं बनी
नन्हे फरिश्ते सी
मनचाही
हमारी बानी|
जो विचलित करती है
फिर अपने पनपने को
उस सब के साथ
जो जरूरी है|
खुद की वो बात
जिससे हमे नफ़रत है,
और हमें नहीं पता
कि वो हममें कहाँ है
पर जो तरीकों में नज़र आए,
उसको समझाने की
जरूरत नहीं|
हर किसी के भीतर
एक असीम आनंद की किलकारी है
जन्म लेने को तैयार|
और
यहां
बड़बड़ाती
रात में
मुझे सुनाई देती है,
अखरोट पेड़ की
बच्चे के पालने ऊपर
लहलाहट,

अपने अंधेरी शाखाओं से
हवा में
और अब बरसात
आकर
मेरी खिड़की पर दस्तख़ देती है
और कहीं और
तारों और हवा की
इस ठंडी रात में,
वो पहली बुदबुदाहट है,
उन छुपी और
नज़र न आने वाली वसंत कि
अंगड़ाई की,
ठहरी गर्मी की हवा की वजह से,
हर एक अभी तक
अकल्पित,
सर उठाती हुई!!



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