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चौबीस दूनी...?

चौबीस दूनी अड़तालीस, अब भी उतनी ही ख़ालिस, वही प्यास, वही आलस (सुबह 6 बजे) न गुस्सा कम, न प्यार, बातें चार, मर्ज़ी से मन और मर्ज़ी से लाचार, घर का अचार, सुविचार!! रंग बदले हैं (समझ जाइए) पर ढंग नहीं, साथ बदला है पर संग नहीं, ताकत बढ़ रही है, कमजोरी कम नहीं होती, कितनों का यकीन हैं, नज़र महीन है, कदम कदम चाल है, और उफ़क़ परे ख्याल है दर्द गहरे हैं, और क्या, वही ख़ास है अब वज़ह, सवाल मासूम हैं, "ऐसा क्यों नहीं? समझते क्यों नहीं?" रास्ते दिखते हैं पर कदमों से दूर हैं, सौ मजबूर हैं, पर हाथ खड़ें नहीं हैं, कंधे झुके नहीं हैं, उम्मीद ज़ारी है, जो बन पड़े , बुनते हैं बड़े गौर से सुनते हैं, साथ उनके, सब सपने बुनते हैं! रास्ते अभी भी वैसे ही,  तय नहीं हैं, कहीं पहुंचना है ये चलने की वज़ह नहीं है! रुकना वज़ह है केवल, कोई तय जगह नहीं है! अजनबी नहीं हम,  आप पहचानते नहीं हैं, आपके आइनों को हम मानते नहीं हैं!

रास्ता मुसाफ़िर!

मुसाफ़िर, कोई रास्ता नहीं है! आपके कदमॊं कि निशान हैं बस! मुसाफ़िर, कोई रास्ता नहीं है!! आप चलिए और वही आपका रास्ता है,  आगे बढिए और अपना रास्ता बनिए,  मुड कर देखिए और जानिए, आ पहुँचे, वो मोड़? फिर कभी उस पर न जाना हो, मुसाफ़िर, कोई रास्ता नहीं है समंदर में किसी नौका की टिमटिमाती रोशनी है! बस! - एंटोनियो मचाडो की मशहूर स्पेनिश कविता 

सब हमसफ़र!

ये एक सुबह थी,  कोई एक वजह थी, सब मौजूद दे, ठीक वहीं,  जहां उनकी जरूरत थी, उनको भी, वहां ही होना था, उनकी भी एक वजह थी! रास्ते में सब हमसफ़र हैं! आप क्यों अकेले हैं? हर ओर मेले हैं, ज़िंदगी के ज़िंदगी को आप क्यों रुके हैं? दो कदम चलिए! ज़िंदगी हमसफ़र है!

ज़रा ज़रा!

जरा सा मुस्कराना उनका नज़रें फ़िराना ज़रा सा ज़रा सी हौंसला आफ़ज़ाई तड़पाना जरा सा जरा सा बल खाना, लड़खड़ाना जरा सा जरा सा छेड़ना, तड़प जाना जरा सा जरा जुल्फ़ों का उड़ना, बिखर जाना जरा सा दिले आबाद का, दिले-बरबाद से फ़र्क जरा सा ज़रा सा एक बड़ाये हाथ, साथ एक दे ज़रा सा मुश्किल नहीं मुसाफ़िर, सफ़र जिंदगी का ज़रा सा ज़रा सी आकांक्षायें और लालच ज़रा सा बहुत है, इंसान का बहक जाना जरा सा ज़रा सा हौसला रखना, हिम्मत ज़रा सी ज़रा सा गम, ज़रा खुशियाँ, ज़िंदगी ज़रा सी ज़रा से उनके सपने हैं ज़रा हमने भी देखे हैं, साथ था, फ़िर भी रात सो लिये ज़रा सा! ज़रा सा जज़्बा चलने का, साथ कुछ दूर तलक ज़रा सी कोशिश किसी मोड़ कोई और फ़लक!

ईबारत ए सफ़रनामा

बैठेंगे किस करवट, सौदे सफ़र के, रास आयेंगे सवालात दर-बदर के? ज़िंदगी आसान करते हैं मुश्किलें मेहमान करते हैं जो करें ज़ी-जान करते हैं वो और हैं जो नाम करते हैं!  निकल पड़े एक और ड़गर, एक और सफ़र झोली भी बदल गयी और नया समान भर, इतनी मुलाकातें जज़्ब है दिलो-दिमाग के घर घर जायेंगे पर अब वो अज़नबी शहर-नज़र  मुसाफ़िर कदमों को गिनें, कि रास्तों को चुनें, गुजरें अज़नबी बन कि, नये रिश्ते कुछ बुनें! फ़िर नया सामान है, कंधों में वही जान है, कदम चल रहे हैं अपनी धुन, और क्या काम है? बह गये पानी में सारे शिकन पेशानी के, युँ मिल गये रास्ते, सब को आसानी के!  युँ भी गुजरे हैं रास्ते, रस्तों से आज़, अपनी ही पहचान का कहां अंदाज़, बुंदें समंदर हुयी जाती है, मज़े लुट रही हैं, हर कदम हकीकतें आज़! आवारा कभी भी थोड़े कम न हो हालात कभी ज्यादा गम न हो अज़नबी रास्तों की मुश्किलें अच्छी, ज़ज्बा-ए-बंजारगी कभी कम न हो! हमसफ़र हैं पर साथ नहीं देते, रस्तों को ज़जबात नहीं देते रुकी हुई हैं कितनी सुबहें, क्यों कदमॊं को अंदाज़ नहीं देते? कुछ शोर है कुछ खामोशी भी, कुछ होश है, और मदहोशी भी, अकेले स...

बातों बातों में.....

कहीं कुछ रोकता है क्यों.... खुला दिलो-दिमाग हो तो दरवाज़े दीवार नहीं होते, आपस की बात है, वरना ये आसार नहीं होते  देखने और होने के बीच के फ़ांसले .... नज़र आँखों में नहीं यकीन में होती है,  एक हंसी से भी जिंदगी हसीन होती है! सब एक नाव में सवार हैं . . . आपको हमारे माथे की पेशानियां नहीं दिखती, जमीं रहने दो, वरना लब्जों में जान नहीं दिखती सफ़र आपके भी हैं और अपने भी.... गुजरते हुए लम्हे हैं गुमराह मत हो,  मुश्किलें मील का पत्थर हों, सफ़र न हों! तक्दीर फ़क्त एक रास्ता है,  मंज़िल नहीं होती, मुश्किल, मुसाफ़िर न हो, तो वो मुश्किल नहीं होती! मुसाफ़िर होना फ़कीरी काम है, सफ़र में यही बस एक नाम है!.... हमारा दुनिया में होना ही एक सफ़र होता है,  कौन सी राह से गुज़रेंगे, ये अपनी नज़र होता है! मुसाफ़िर रहना हो तो फ़कीरी अंदाज़ हों, कटोरा हम देंगे मुबारक आपकी आवाज़ हो! हाथ फ़ैला दिये तो कटोरा तैयार है,  दिखती सामने होगी, पर जहन में है, वो जो दीवार है, सच करवट बदलते हैं.... दुविधा भी सुविधा का दुसरा नाम है, वो बहकना क्या जो हाथों मे जाम है? मोड़...