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बस यही बात है!

  साथ है बस यही बात है हां कई जज़्बात है,  जज़्बात काफूर हैं साथ हालात है, साथ है बस यही बात है! साथ है, दिन है, रात है, काम की बात है,  ज़ाहिर मुश्किलात है, मुश्किल कम’उम्र है, साथ सफ़र है, साथ है बस यही बात है! साथ है, मुलाक़ात है, तुमसे तो, खुद से भी, अजनबी फिर भी कई लम्हात हैं, बाक़ी कई बात हैं, सो साथ हैं  बस यही बात है! साथ हैं, सवालात हैं, तमाम जवाबों के, जो अधूरे हैं, जो बदल गये, कुछ फिसल गए, छूटे नहीं हैं, साथ हैं, बस यही बात है!

खामोश बातें!

मत कहो हमसे, कुछ कहने को, आज बस हमको चुप रहने दो... क्या है कहा नहीं जो, क्या है सुना नहीं जो, क्यों वक़्त को अपने हालात बनाएं, जो है वो भरोसा रहने दो! आज बस हमको चुप रहने दो... कुछ शिकवे हमारे जो कुछ उनकी शिकायतें वो, ये हसींन मुश्किलें क्यों सुलझाएं, जो हैं जज़्बात रहने दो! आज बस हमको चुप रहने दो... सच अपने सपने हैं जो, सपने जो उनके सच हैं! वो ये फ़र्क किस किस को समझाएं? कुछ तो बिन-बात रहने दो आज बस हमको चुप रहने दो... इतने नज़दीक हैं जो, दूरी उतनी हो क्यों, पास से फासलें यूँ नज़र आएं, आपस की बात है रहने दो! आज बस हमको चुप रहने दो!!

सब हमसफ़र!

ये एक सुबह थी,  कोई एक वजह थी, सब मौजूद दे, ठीक वहीं,  जहां उनकी जरूरत थी, उनको भी, वहां ही होना था, उनकी भी एक वजह थी! रास्ते में सब हमसफ़र हैं! आप क्यों अकेले हैं? हर ओर मेले हैं, ज़िंदगी के ज़िंदगी को आप क्यों रुके हैं? दो कदम चलिए! ज़िंदगी हमसफ़र है!

इश्क सलामत. . . !

चलो इश्क लड़ाएं ,  अच्छा लड़ाई क्यों,  इश्क रहने दो बस  तुम हो, मैं हूँ, साथ है, कुछ बात है तुम अब भी शर्मा जाती हो, मैं अब भी घबरा जाता हूँ फिर क्यों हम अपनी संवेदना से खेल रहें हैं मैं अब भी कम सुनता हूँ, तुम अब भी देर से उठती हो अब भी तुमारी बिरयानी मेरी चाय है, मुझे अब भी सही करवट लेना नहीं आता तुमको भी कहाँ ठीक से सोना आता मैं नहीं होता तो अब भी तुम MISS करती हो मौका मिल जाए तो, मैं भी पास आकर .... खैर छोड़ो तुम अब भी मुझे मर्द समझती हो मैं अब भी दर्द नहीं समझता अगर कुछ नहीं बदला  तो दर्द क्या है, कौन सी चोट है शायद हमारे देखने में खोट है या कोई पुरानी  चोट है और हम मलहम नहीं बन पा रहे कौन से घाव है जो नज़र नहीं आ रहे अरे . . .  कुछ करवटें हैं कुछ सलवटें बनी नहीं कितनी रातें है अपनी जो बिन गुजरे ही रह गयीं सोचता हूँ. . . कैसे हम बीमार हैं कि आपको बुखार है किसका हो इलाज, किसको ये अजार है सोचें तो. . .  कैसी ये अपने बीच ज़ख्मों कि दीवार है इश्क तुमसे है गर तो क्यों जख्मों से प्य...

एक बात की सौ बात!

खुद से दूर जाने की कोशिश तमाम की मैंने जाने अपनी कितनी नींदे हराम की, किसको नज़र आये चेहरे के रेगिस्थान क्यूँ अपनी सारी मुस्कराहट शमशान की? हमसफ़र, साथ देने के शौक तन्हा कर गए हाथ आये फ़ासले जब भी, राय कोई आम की शराफत के सब सौदाई, इतनी इज्ज़त-अफज़ाई कहाँ खरीददार कोई, जो दुकान-ए-ईमान की बंजर जमीन ने कितने इरादे चट्टान किये यूँ माथे की सारी परेशानी पीक-ए-पान की चलते रहे, यूँ अपने ही तूफानों के छोर थाम हमने कहाँ कभी अपनी, मुश्किल आसान की 

रास्ते के कंकड़

फुर्सत के दिन, या दिन में फुर्सत नहीं, देखिये करवट लेती हैं हसरतें कहीं, दिल की हरकतों के क्या दाम कीजे शौक अच्छे हैं, काम मत कीजे! हम अपना सफर होँगे, अपने रास्तों का असर होँगे, मील का पत्थर नहीं बनना, काबिल हमसफ़र होँगे उनके देखने में कुछ ऐसा असर, तलाश करते हैं कहीं कोई कसर, उम्मीद को क्या समझाएं, नज़र-अंदाज़ हैं या अंदाज़-ए-नज़र ! खुद को खोना है, खुद को प्यार करना उम्मीद से आज़ाद हो, फिर यार करना आपने सपने चुने, और हम काबिल बनें? तस्वीर आपकी, रंग हम क्यों  बनें? अधूरे अल्फाज़ रास्ता भटकते हैं, कदम कब इनकी राह तकते हैं,, हो गए अजनबी अनगिनत लम्हे, अब हम आइना तकते हैं ! वक़्त चलता है, फिसलता है, टलता है, निकलता है मुश्किल हैं ऐसे लम्हे जब खुद का साथ मिलता है चलता है, मुड़ता है, मिलता है बदलता है आपके पैरों से ही रास्ता निकलता है.... ख़ामोशी रास्ता ढूंड लेगी, तुम साथ चलते रहना खुद तक पहुँच जाओ तो अपना सलाम कहना,

एक दो तीन. . . चौदह,पन्दरह

--> बचपन के तेरह , अल्हड़पन के पांच जवानी के छह – आठ और दीवानगी के पन्द्रह कभी सोचा था  ? दीवानगी सबसे काबिल साबित होगी  ! हाथ होगी  , साथ रहेगी  , मुश्किलो  की बात रहेगी , और मुश्किलो को मात रहेगी एक उम्र पीछे छोड दी  , बचपन , अल्हड़्पन और जवानी  , नहीं कह सकते  , हार मान गये  , पर ये जरुर भान गये  , जान गये  , दाल कभी कभी गल सकती है  , जल सकती है , पर पल नहीं सकती या फिर युँ कहिये , कि सब ने अपनी जगह ढ़ुंढ ली  , बचपन आता है  , टोह लेने  , खेल जाता है , तु - तु , मैं - मैं , अड़ जाता है कभी जिद्द् पे  , जाओ कट्टी ! निराश होने कि बात नहीं  , जवानी भी तो ताक लगाये बैठी है  ,  मन ही मन कहती है  , “ मिठ्ठी - मिठ्ठी " अल्हड़्पन भी कुछ कम नहीं सताता  , अपनी धुन में आ जाये तो उसे कुछ नहीं भाता  , मुँह फ़ुला , और कुछ नहीं बताता  , चॆहरे के सामने पीठ होती है  , ये उमर ही ऐसी ढ़ीट होती है  , और चंच...