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चाल चलन!

यूँ हालात है और नदारत सब सवाल है,
कौन चल रहा है और किसकी चाल है?

नज़र आता है और सबको मलाल है?
"यही होता आया" किसकी मज़ाल है?



सबको लगता है के उनका दिल साफ है!
नज़र फेर ली है और अपना खून माफ़ है?

ताकत सच है कमज़ोर का क्या हक़ है?
पैदाइशी बराबरी ये भी एक कमाल है!!


भक्ति धर्म है और चौतरफा कचरा कर्म है,
चौखट पर सर है और कलयुग काल है?

नफ़रत पल रही है ओ शिकारी शिकार हैं,
गुस्सा सभी को है और ये भेड़चाल है!!


देवघर एक धर्मस्थल श्रद्धालुओं के कचरे से लिप्त
धर्मभक्ति, देशभक्ति आज दोनों बेलगाम हैं,
गुंडों की टीम है और सियासत कप्तान है!!


(देवघर, झारखंड में 10 दिन गुजारे, सवाल दिमाग में आये, वहां धार्मिक टूरिस्ट के फैलाए कचरे से, ये वही लोग हैं जो राम मंदिर चाहते हैं? वही लोग जो स्वच्छ भारत को तत्कालीन सरकार की उपलब्धि मानते हैं। वही लोग अपनी सोच और कर्म से भारत को प्रदूषित तो नहीं कर रहे?)




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